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मुसलमानों का ही मसला नहीं है खालिद मुजाहिद की मौत

लखनऊ, 30 मई: फैजाबाद में पेशी से वापस आते वक्त खालिद मुजाहिद की पुलिस के कब्जे में अचानक हुई मौत पर कुछ खुदसाख्ता मुस्लिम रहनुमाओं और तंजीमों ने गैर जरूरी हंगामा करके इसे महज मुसलमानों का मसला बता कर एक बेगुनाह की मौत के अहम मसले को

लखनऊ, 30 मई: फैजाबाद में पेशी से वापस आते वक्त खालिद मुजाहिद की पुलिस के कब्जे में अचानक हुई मौत पर कुछ खुदसाख्ता मुस्लिम रहनुमाओं और तंजीमों ने गैर जरूरी हंगामा करके इसे महज मुसलमानों का मसला बता कर एक बेगुनाह की मौत के अहम मसले को हल्का करने का जुर्म किया है।

खालिद मुजाहिद को उत्तर प्रदेश पुलिस और इसकी एसटीएफ ने गलत तरीके से झूटे व गढ़े हुए सुबूतों की बुनियाद पर बम धमाकों का मुल्जिम बना दिया था। पुलिस की इस हरकत के खिलाफ सबसे ज्यादा खुलकर तहरीक चलाने वालों में रिटायर्ड डीजी पुलिस एसआर दारापुरी, कानपुस से साबिक लोकसभा मेम्बर सुभाषिनी अली, मशहूर समाजी कारकुन संदीप पाण्डेय और लखनऊ यूनिवर्सिटी की साबिक वाईस चांसलर डाक्टर रूप रेखा वर्मा वगैरह ही रहीं हैं।

अब 18 मई को पुलिस की एक टीम खालिद मुजाहिद समेत चार मुल्जिमान को पेशी पर फैजाबाद ले गई थी। वापसी में राम सनेही घाट के नजदीक खालिद की अचानक तबियत खराब हुई। उन्हें अस्पताल या किसी डाक्टर तक पहुंचाया जाता इससे पहले ही उनकी मौत हो गई। उनकी मौत की वजह जेल इंतेजामिया और पुलिस की लापरवाई है। उनकी तबियत खराब थी। फैजाबाद जेल ले जाने से कब्ल सुबह उन्हें जिन दवाओं की जरूरत थी लखनऊ जेल में उन्हें वह दवाएं भी फराहम नहीं कराई गईं।

खालिद मुजाहिद के इंतेकाल पर अहमद बुखारी जैसे कई खुदसाख्ता मुस्लिम ठेकेदार मुसलमानों के नाम पर कागजी तंजीमें चलाने वाले सरगर्म हो गए। उन्होंने इंसानियत और इंसानी हुकूक के खिलाफ हुई हरकत को मुस्लिम मुखालिफ हरकत करार दे दिया।

मोहम्मद अदीब नाम के एक राज्य सभा मेम्बर ने तो दिल्ली और लखनऊ से शाय होने वाले एक उर्दू अखबार को बयान दे दिया कि अगर 12 घंटे के अंदर उत्तर प्रदेश की हुकूमत ने खालिद मुजाहिद के कातिलों को सजा न दी तो उत्तर प्रदेश के मुसलमान सड़कों पर उतरेगा।

बाद में यह बयान देने वाले बहादुर एमपी गायब ही हो गए। खालिद मुजाहिद की मौत सिर्फ और सिर्फ इंसानी हुकूक (मानवाधिकार) की पामाली का मामला है। जिन लोगों ने इसे मुसलमानों का मामला बनाया वह खालिद के साथ इंसाफ नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके केस को कमजोर करने का जुर्म कर रहे हैं।

इस मामले को इंसानी हुकूक की पामाली और पुलिस हिरासत में मौत की शक्ल में देखा जाना चाहिए ताकि बेगुनाह को मौत के बाद इंसाफ दिलाने में समाज के हर तबके का तआवुन हासिल होता रहे। राष्ट्रीय उलेमा कौंसिल बनाकर मुसलमानों की सौदेबाजी और बड़े पैमाने पर चंदा वसूलने वाले आमिर रशादी नाम के एक शख्स ने इस मामले को ऐसा फिर्कावाराना रंग दे दिया कि मौके की तलाश में बरसों से बैठे फैजाबाद के कुछ फिरकापरस्त वकीलों ने फैजाबाद के मुस्लिम वकील जमाल अहमद और सलीम अहमद पर हमला करके उन्हें शदीद तौर पर जख्मी कर दिया।

इन मुस्लिम वकीलों का गुनाह सिर्फ यह है कि उन लोगों ने दहशतगर्दी के झूटे मामले में फंसाए गए खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी की अदालत में पैरवी करते हैं।

पुलिस हिरासत में जेल अफसरान की लापरवाई से मौत के मुंह में ढकेले गए खालिद मुजाहिद के चचा जहीर आलम फलाही की तहरीर पर कोतवाली में साबिक डीजी पुलिस विक्रम सिंह, एडीजी ला एण्ड आर्डर रहे बृजलाल समेत उन 42 पुलिस वालों पर खालिद को कत्ल कराने का मुकदमा दर्ज किया जा चुका हे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला अखिलेश यादव ने इस मामले की तहकीकात सीबीआई के जरिए कराने की सिफारिश भी कर दी।

अपनी रिपोर्ट में खालिद के चचा जहीर आलम फलाही ने इल्जाम लगाया है कि उस वक्त के डीजी पुलिस विक्रम सिंह और एडीशनल डीजी ला एण्ड आर्डर बृजलाल ने पुलिस और एसटीएफ के चालीस पुलिस वालों के जरिए जौनपुर जिले के मडियाहूं कस्बे से 16 दिसम्बर दो हजार सात को बेगुनाह खालिद मुजाहिद और उससे पांच दिन कब्ल बारह दिसम्बर को आजमगढ़ के सरायमीर से तारिक कासमी को अगवा कराया था।

अगवा करने वाली टीम में आईबी के दो अफसरान के साथ एस आनंद, चिरंजीव नाथ सिन्हा और मनोज कुमार झा वगैरह शामिल थे। बाद में बृजलाल और विक्रम सिंह ने एक साजिश के तहत बाइस दिसम्बर को इन दोनों को बाराबंकी स्टेशन से गिरफ्तार दिखवाया और दावा किया कि इन दोनों के कब्जे से बड़ी मिकदार (मात्रा) में धमाकाखेज अशिया (विस्फोटक पदार्थ) बरामद हुआ है। पुलिस ने इन दोनों पर फैजाबाद व लखनऊ कचेहरियों में हुए बम धमाकों के अलावा दीगर कई संगीन मामलात लाद दिए।

जज आर डी निमेश कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस की साजिश का भंाडा फोड़ते हुए दोनों को बेगुनाह करार दिया है। इसी बात से घबरा कर विक्रम सिंह और बृजलाल वगैरह ने साजिश करके खालिद मुजाहिद को पुलिस हिरासत में कत्ल करा दिया। इस रिपोर्ट पर विक्रम सिंह का जो बयान आया वही उन्हें गुनाहगार साबित करने के लिए काफी है। उन्होंने कहा कि खालिद मुजाहिद एक दहशतगर्द था और हमेशा उसका नाम दहशतगर्द से जुड़ा रहेगा।

सवाल यह है कि अभी अदालत में उसके दहशतगर्दी होने का इल्जाम साबित नहीं हुआ है तो विक्रम सिंह इस किस्म का दावा कैसे कर रहे हैं जाहिर है उन्होंने ही खालिद पर दहशतगर्द होने का लेबिल लगाया था जो झूटा है। खालिद मुजाहिद की मौत या पुलिस हिरासत में हुए कत्ल के वाक्ये ने उन तमाम खुदसाख्ता मुस्लिम ठेकेदारों को अपनी नेतागीरी चमकाने और खालिद के नाम पर चन्दा वसूली का मौका दे दिया।

दिल्ली वक्फ बोर्ड की तंख्वाह पर जामा मस्जिद में इमामत करने वाले अहमद बुखारी की ब्लैकमेलिंग से तंग आकर उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के कौमी सदर मुलायम सिंह यादव ने उनसे किनाराकशी कर ली थी। अहमद बुखारी कई महीनों से इन दोनों लीडरान से मुलाकात करने की जोड़ तोड़ कर रहे थे।

खालिद मुजाहिद के कत्ल के बहाने अगले ही दिन यानी उन्नीस मई को लखनऊ आए और बेशर्मी के साथ उन्हीं दोनों लीडरान के घर पहुंच गए जिनके खिलाफ चंद दिनों कब्ल वह उत्तर प्रदेश में वह अवामी तूफान खड़ा करने का दावा कर रहे थे। अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव से अलग-अलग मुलाकात करने के बाद अहमद बुखारी ने मीडिया नुमाइंदों से झूट बोला और कहा कि अखिलेश यादव ने उनके तमाम मतालबात पर गौर करने और खालिद मुजाहिद के घर वालों को मुआविजा देने का भरोसा दिया है।

दूसरी तरफ वजीर-ए-आला अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के करीबी जराए का कहना है कि उन दोनों ही लीडरान ने अहमद बुखारी को सिर्फ चाय पिलाई उनसे कोई वादा नहीं किया क्योंकि वह दोनों अब बुखारी को अच्छी तरह समझ चुके हैं। अखिलेश यादव के एक करीबी अफसर का कहना है कि अहमद बुखारी से मिलने से पहले ही वह इस मामले की सीबीआई तहकीकात कराने का फैसला कर चुके थे।

रही बात मुआविजे की तो अगर वह मुआविजा देने का वादा करते तो उसका एलान वह खुद करते या फिर सरकार की जानिब से उसका एलान होता उसका एलान अहमद बुखारी से क्यों कराते? अपना नाम पोशीदा रखने की शर्त पर इस अफसर ने बताया कि अहमद बुखारी ने अंदर बैठ कर तो चीफ मिनिस्टर से खुद ही यह वादा अपनी तरफ से किया था कि वह (बुखारी) इस मामले में आम मुसलमानों को संभाल लेंगे।

हुकूमत या वज़ीर ए आला को इसके लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। इस अफसर के मुताबिक बुखारी ने यह भी कहा था कि खालिद मुजाहिद की मौत की सीबीआई तहकीकात कराने की भी जरूरत नहीं है। अब बाहर निकल कर वह मीडिया के सामने क्या-क्या दावे कर रहे हैं इससे हुकूमत या चीफ मिनिस्टर को कुछ लेना देना नहीं है। अहमद बुखारी की तरह ही आजमगढ़ में चंदा वसूलने के शातिर कहे जाने वाले उलेमा कौंसिल के नाम पर अपनी सियासत चमकाने वाले आमिर रशादी ने भी मुलायम सिंह यादव और वज़ीर ए आला अखिलेश यादव से मिलने की बहुत कोशिशें की लेकिन नाकाम रहे।

खबर है कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव उनसे इसलिए मिलने को तैयार नहीं हुए कि आजमगढ़ में खुद आमिर रशादी के साथ चलने वाले एक मुस्लिम नौजवान को बीजेपी के लोकसभा मेम्बर रमाकांत यादव वगैरह ने उस वक्त गोली मार कर कत्ल कर दिया था जब रमाकांत और आमिर रशादी के गिरोह आमने सामने आकर टकरा गए थे।

उस कत्ल मामले में रमाकांत गिरफ्तार होकर जेल चले गए थे। खुद आमिर रशादी चश्मदीद गवाह थे। कुछ महीनों बाद आमिर रशादी ने उस मुस्लिम नौजवान के खून का सौदा कर लिया और अपने बयान से पलट गए और रमाकांत यादव जेल से बाहर आ गए। इस वाकिये की खबर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव दोनों को है इस लिए वह लोग रशादी को मुलाकात के लायक नहीं समझते और मिलते भी नहीं है।

अपनी नेतागीरी चमकाने के लिए आमिर रशादी ने तेइस मई को लखनऊ में मीडिया नुमाइंदों से मिले और एक तहरीरी बयान जारी करते हुए दावा किया कि खालिद मुजाहिद के कत्ल मामले में रियासत के डीजी पुलिस देवराज नागर और एडीशनल डीजी लाॅ एण्ड आर्डर अरूण कुमार ने उनसे फोन पर बात की थी।

खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी की गिरफ्तारी शुरू से ही सवालात के दायरे में रही है। वाराणसी, फैजाबाद और लखनऊ कचेहरियों में बम धमाके हो चुके थे। उत्तर प्रदेश पुलिस उन बम धमाकों का पता लगाने और अस्ल मुल्जिमान तक पहुंचने में नाकाम थी। चारो तरफ से पुलिस की नाकामियों पर उंगलियां उठ रही थी तभी एसटीएफ ने तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद को उन बम धमाकों में मुल्जिम बनाकर उनके घरों से अगवा कर लिया था। उत्तर प्रदेश की शातिर पुलिस ने सिर्फ इन दोनों को अगवा करके दहशतगर्द ही नहीं बनाया।

मामले को और ज्यादा संगीन बनाने की गरज से फैजाबाद और लखनऊ के कुछ फिरकापरस्त जेहन वकीलों का इस्तेमाल करके पुलिस ने उनके जरिए हंगामा कराया और उन वकीलों पर हमले कराए जिन्होंने खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी की अदालत में पैरवी करने के लिए वकालत नामे दाखिल किए थे।

फैजाबाद के जमाल अहमद एडवोकेट को जिला बार एसोसिएशन से निकाल दिया गया था। खालिद मुजाहिद के पुलिस हिरासत में कत्ल के खिलाफ बीस मई को फैजाबाद में कुछ गैर जिम्मेदार लोगों ने मजाहिरा किया। इस मजाहिरा में शामिल होने का इल्जाम लगाकर बार एसोसिएशन पर काबिज वकीलों ने पहले तो कई मुस्लिम वकीलों के चैम्बर्स में तोड़ फोड़ की फिर एक मीटिंग करके शकीलउर्रहमान, नदीम अहमद और सलीम अहमद एडवोकेट को जिला बार एसोसिएशन की मेम्बरशिप से बर्खास्त कर दिया। कानून की हिफाजत और बेगुनाहों को इंसाफ दिलाने का हलफ लेकर वकालत के पेशे में आए फैजाबाद के कई वकीलों ने न सिर्फ कानून की धज्जियां उड़ाई बल्कि अदालत में गुनाह साबित होने से कब्ल ही इन लोगों ने खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी को महज पुलिस की झूटी थ्योरी की बुनियाद पर ही दहशतगर्द करार दे दिया।

उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में खालिद मुजाहिद का कत्ल कोई पहला मामला नहीं है। लखनऊ जेल में ही बंद डिप्टी सीएमओ वाईएस सचान का कत्ल हो चुका है तो गाजियाबाद के डासना जेल में कविता चैधरी कत्ल मामले के मुल्जिम रवीन्द्र प्रधान उर्फ भूरा की पुरअसरार मौत का मामला अभी तक सुलझा नहीं है। कोई एक महीना कब्ल लखनऊ के हसनगंज थाने के लाकप में एक नौजवान फांसी पर लटका मिला था।

आगरा के थाना सदर इलाके में जेवर चोरी के शक में पकड़े गए जूता कारीगर धरम सिंह को पुलिस हिरासत में पीट-पीट कर कत्ल कर दिया गया था। गुजिश्ता नवम्बर में एटा के इसौली गांव से कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार बलबीर का पुलिस हिरासत में कत्ल हुआ था। आगरा में ही गुजिश्ता साल बीस सितम्बर को चैबीस साल के रामू को पुलिस ने पकड़ा था अगले दिन खेत में उसकी लाश मिली थी। इसी अप्रैल की 28 तारीख को गाजियाबाद के इंदिरापुरम के हवालात में एक नौजवान को मार कर पुलिस ने उसकी लाश रोशनदान से टांग दी थी। गुजिश्ता छः सालों में सिर्फ गाजियाबाद में ही तकरीबन एक दर्जन लोगों को पुलिस हिरासत में कत्ल किया जा चुका है। खालिद मुजाहिद के कत्ल से महज अट्ठारह दिन कब्ल प्रतापगढ़ के रानीगंज थाने में तीस साल की खातून हेमा का कत्ल हुआ तो सिर्फ पांच रोज कब्ल पुलिस हिरासत में बनारस से कानपुर लाते वक्त राजेश पाल को ट्रेन से नीचे फेंक दिया गया। उसकी मौत हो गई तो पुलिस ने कह दिया कि वह तो खुद ही चलती टेªन से कूद गया था।

सरकारी इत्तेला के मुताबिक गुजिश्ता छः महीनों में ही लखनऊ में एक, प्रतापगढ़ में दो, आगरा में दो और गाजियाबाद में पांच लोगों समेत तकरीबन डेढ़ दर्जन लोगों को पुलिस हिरासत में मौत के घाट उतारा जा चुका है। इस हकीकत के बावजूद जो लोग महज अपने मुफाद ( फायदे) में खालिद मुजाहिद के मामले को मुसलमानों का मामला बना रहे हैं वह खालिद के साथ धोखेबाजी कर रहे हैं और उनके केस को कमजोर करने का जुर्म कर रहे हैं। (हिसाम सिद्दीकी)

बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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