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मुसलमानों की मौजूदा हालात को देखते हुए अमेरिका को मौका मिला, अब अरब वर्ल्ड में नेतृत्व की दरकार

यूरोप के ईसाइयों ने 1095 और 1291 के बीच अपने धर्म की पवित्र भूमि फिलिस्तीन और उसकी राजधानी जेरूसलम में स्थित ईसा की समाधि का गिरजाघर मुसलमानों से छीनने और अपने अधिकार में करने के प्रयास में जो युद्ध किए उनको सलीबी युद्ध, ईसाई धर्मयुद्ध, क्रूसेड (crusades) अथवा क्रूश युद्ध कहा जाता है। इतिहासकार ऐसे सात क्रूश युद्ध मानते हैं। हालांकि यरुसलम का इतिहास बहुत ही पुराना है, फिर भी संक्षेप में कहे तो अंतिम बार मुसलमानों के हाथों में यरुसलम सलाउद्दीन अयूबी के काल में आया।

अयूबी ने ११८७ में जब येरुशलम पर विजय प्राप्त करी तो पोप के आह्वाहन पर इंग्लैंड का बादशाह रिचर्ड दा लाइन हार्ट (Richard the Lionheart) फ्रांस का बादशाह और जर्मनी का बादशाह फेडरिक (Frederick Barbarossa) की सेना ने हमला किया लेकिन सलुद्दीन ने अलग अलग युध्दो में फेडरिक की सेनाओ को पराजित किया। वह जितना बड़ा योद्धा था, उतना ही बड़ा और कुशल शासक था। इसके साथ ही न्यायप्रिय और रहम दिल भी था।यही कारण है कि यूरोप के इतिहासकार भी उसके सम्मान और महानता में प्रसंशा करते है। इस्लामी इतिहासकार तो यह तक कह देते हैं कि इस्लामी रशीदुन खलीफाओँ के बाद इतना कुशल शासक चरित्रवान और योद्धा कोई नहीं हूआ। खैर, जमाना बीता और अब आधुनिक जमाना है, पूरी तरह से अब यरुसलम मुसलमानों के हाथों नहीं रहा। कह लीजिए कि यरुसलम मुस्लिमों के हाथों से निकल चुका है।

सलीबी या क्रूसेड (धर्मयुद्ध) के बाद से ही यूरोप के ईसाईयों ने येरूशलम से अपना नाता तोड़ लिया था. दरअसल, बारहवीं सदी में ईसाई धर्मयुद्ध इस्लाम से हार गये और तब उन्होंने अपना मक्का रोम और वेटिकन सिटी को बना लिया. इसलिए उनकी दिलचस्पी येरूशलम को लेकर कम ही दिखती है. हां, इनकी सहानुभूति जरूर है येरूशलम के प्रति, लेकिन न तो प्रोटेस्टेंट वहां जाते हैं और न ही कैथोलिक ही जाते हैं. कुल मिलाकर, जब तक अरब वर्ल्ड एकजुट नहीं होगा, तब तक इस मसले पर बाहर से कोई समर्थन या सहयोग नहीं मिलेगा. जाहिर है, अरब वर्ल्ड में नेतृत्व की दरकार है.

बहुत जमाने से अमेरिका यह कोशिश कर रहा था कि येरूशलम को इस्राइल की राजधानी बनायी जाये. इस वक्त अमेरिका यह सबसे मुफीद वक्त लगा, क्योंकि पूरे अरब वर्ल्ड में इस वक्त एक अरसे से फूट चल रही है. अरब लीग और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल में भी अलगाव हो गया है. सऊदी अरब एक तरफ है, तो कतर दूसरी तरफ है.

फिलिस्तीनी प्रेसिडेंट महमूद अब्बास कुर्सी पकड़कर बैठे हुए हैं, वहीं गाजा में हमास भी बंटा हुआ है. इन्हीं सब हालात का फायदा उठाया है अमेरिका ने.

एक तरफ सऊदी अरब और यमन में लड़ाई तो चल ही रही है, वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब अपने उत्तराधिकार को लेकर कशमकश में है कि अब अगला किंग कौन बनेगा. मौजूदा किंग अपने बेटे को किंग बनाने की कोशिश में हैं और बहुत से दूसरे महत्वपूर्ण किंग दावेदार सऊदी की जेल में बंद हैं. सऊदी अरब पहले नेतृत्व की भूमिका अदा करता था, जो अब इस स्थिति में नहीं है. इस हालत को देखते हुए अमेरिका को एक मौका मिल गया कि वह येरूशलम को इस्राइल की राजधानी घोषित कर दे और ट्रंप ने ऐसा कर दिया.

दो-चार जगहों पर छिटपुट हिंसा हो रही है. लेकिन, यह भी ज्यादा समय तक नहीं रहेगा, क्योंकि इसके लिए एक बड़े अांदोलन की जरूरत है और बड़े आंदोलन के लिए सशक्त नेतृत्व की जरूरत होती है, जो फिलहाल तो दिखायी नहीं दे रहा है. अरबों में कोई नेतृत्व नहीं है इस वक्त. पहले किंग अब्दुल्ला थे, जिनकी चलती थी. लेकिन, नये किंग अपने उत्तराधिकार के लिए अपने बेटे को किंगशिप देना चाहते हैं, जो बगैर अमेरिका के संभव भी नहीं है. ऐसे में कोई नेतृत्व उभरेगा, इसकी संभावना बहुत ही कम ही दिखती है.

अरबों में बारगेनिंग क्षमता नहीं है कि वे अमेरिका से इस विषय पर कोई सशक्त बात रख सकें. सऊदी अरब हो, पूरा खाड़ी क्षेत्र हो या फिर मिस्र हो, चूंकि सारे बड़े अरब देश सुरक्षा को लेकर अमेरिका पर ही निर्भर हैं, इसलिए वे बारगेनिंग कर रही नहीं पायेंगे.

मिस्र का इस्राइल के साथ शांति समझौता है, तो वह भी कुछ नहीं बोलेगा. जॉर्डन भी ऐसे ही कारणों से इस्राइल से कोई तकरार नहीं चाहेगा और अपने रिश्तों को बरकरार रखना चाहेगा. हां, अगर कुछ होगा, तो इन देशों के कुछ निंदात्मक बयान आ जायेंगे, ताकि वहां की जनता इस बात को लेकर कोई हंगामा न करने पाये.

जितने भी इस्लामी मूवमेंट हैं, उनके एजेंडे में फिलिस्तीन कभी नहीं रहा है. हां, अरब नेशनलिस्ट के एजेंडे में फिलिस्तीन था, और वे हमेशा ही फिलिस्तीन के लिए लड़ते भी थे.लेकिन, चूंकि अब उनका नेशनलिज्म खत्म हो गया है और कट्टर शक्तियां हावी हो गयी हैं, इसलिए यह भी इस्राइल के खिलाफ कभी कोई आवाज नहीं उठाते.

दरअसल, खाड़ी देश और बड़े अरबी देशों के एजेंडे में ईरान है, फिलिस्तीन नहीं. वे सारे मिलकर इस्राइल से डील भी करते दिखते हैं और सब चाहते हैं कि ईरान से इस्राइल ही लड़ाई लड़े और हिजबुल्ला को कमजोर करे. पूरे अरब वर्ल्ड में मुसलमानाें के एजेंडे में कहीं भी फिलिस्तीन है ही नहीं, और एजेंडे से ही यह बात तय होती है कि नेतृत्व कैसा होगा.

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