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मुसलमानों की वफ़ादारी शकूक-ओ-शुबहात से बालातर: जस्टिस राजिंदर सच्चर

मुस्लिम अक़ल्लियत को ना तो किसी तरह की माज़रत ख़्वाही की ज़रूरत है और ना ही उन्हें एहसास कमतरी में मुबतला होने की, क्योंकि इस मुल्क के दस्तूर ने उन्हें मुल्क का शहरी होने के तमाम हुक़ूक़-ओ-इख़्तयारात दिए हैं इन ख़्यालात का इज़हार आज यहां

मुस्लिम अक़ल्लियत को ना तो किसी तरह की माज़रत ख़्वाही की ज़रूरत है और ना ही उन्हें एहसास कमतरी में मुबतला होने की, क्योंकि इस मुल्क के दस्तूर ने उन्हें मुल्क का शहरी होने के तमाम हुक़ूक़-ओ-इख़्तयारात दिए हैं इन ख़्यालात का इज़हार आज यहां ऑल इंडिया मिली कौंसिल के ज़ेर-ए-एहतिमाम फ़िक्की आडीटोरियम में कारवाँ इत्तिहाद मुल्क-ओ-मिल्लत के इख़तताम पर हुई|

क़ौमी कन्वेनशन में दिल्ली हाईकोर्ट के साबिक़ चीफ़ जस्टिस राजिंदर सच्चर ने अपने शुरुआती कलिमात में किया और कहा कि अक़ल्लियतों के हुक़ूक़ को बैनुल-अक़वामी सतह पर तस्लीम करते हुए अक़वाम-ए-मुत्तहिदा के चार्टर में दर्ज किया गया है जो कि स्टेट के लिए अक़ल्लियतों के हवाले से रहनुमा ख़ुतूत हैं।

जस्टिस सच्चर ने मुसलमानों की वफ़ादारी को शकूक-ओ-शुबहात से बालातर बताते हुए कहा कि मुल्क की सालमियत के लिए बरीगीडीय‌र मुहम्मद उसमान और अब्दुलहमीद की क़ुर्बानियों को फ़रामोश नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आज तक किसी मुसलमान का नाम मुल्क की जासूसी में नहीं आया है जबकि सांझा (कश्मीर) के जासूसी केस में दीगर फ़िर्क़ा से ताल्लुक़ रखने वाले शख़्स का नाम सामने आचुका है।

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