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मुसलमानों की क़ुर्बानीयों को मिटाने फ़िर्कापरस्तों की साज़िश

मुल्क को आज़ाद कराने में मुसलमानों का निहायत ही अहम किरदार रहा है। मुसलमानों ने आज़ादी की लड़ाई में दुसरे अक़्वाम का ना सिर्फ़ साथ दिया बल्कि उनकी क़ियादत की।

मुल्क को आज़ाद कराने में मुसलमानों का निहायत ही अहम किरदार रहा है। मुसलमानों ने आज़ादी की लड़ाई में दुसरे अक़्वाम का ना सिर्फ़ साथ दिया बल्कि उनकी क़ियादत की।

लेकिन इंतिहाई अफ़सोस की बात है कि बाज़ फ़िर्कापरस्त अनासिर आज मुसलमानों की इन क़ुर्बानीयों को मिटाने की साज़िशें कररहे हैं और उन्हें बदनाम-ओ-रुसवा करने की नापाक कोशिशें जारी रखे हुए हैं।

इन ख़्यालात का इज़हार डॉक्टर राजिंदर बाबू स्टेट कोआर्डीनेटर तेलंगाना कोआर्डिनेशन कमेटी ने आर ऐंड बी गेस्ट हाउज़ में एक जलसे को मुख़ातब करते हुए शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान की 9वीं बरसी के मौके पर उन्हें ख़राज पेश करने के लिए एम आर यू एफ़ की तरफ से ये जलसा मुनाक़िद किया गया था।

जिस की सदारत ज़िला सदर एम आर यू एफ़ ज़फ़र उल्लाह सिद्दीक़ी ने की। राजिंदर बाबू ने कहा कि आज तारीख़ को बदलने की कितनी ही कोशिश की जाये हक़ीक़त को बदला नहीं जा सकता।

उन्होंने शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान को ख़राज पेश करते हुए कहा कि अंग्रेज़ों से मुल्क को नजात दिलाने के लिए अपनी जान पर खेलते हुए उन्होंने जद्द-ओ-जहद की।

क़ौमी यकजहती भाई चारगी और उखुवत को वो अज़ीज़ रखते थे इस का सबूत आर्या समाज के क़ाइद राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उनके गहरे ताल्लुक़ात हैं।

ककोरी का वाक़िया जो 1925 में पेश आया था उनकी हुब्ब-उल-व्तनी की मिसाल है। हिंदुस्तान रिपब्लिक आर्गेनाईजेशन ने रेल में जाने वाले अंग्रेज़ों के ख़ज़ाने को लौटा था।

जिस में शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान भी शामिल थे। उन्हों ने इस वाक़िये में शामिल हिंदू भाईयों को बचाने की ख़ातिर सारा इल्ज़ाम अपने सर ले लिया था। आख़िर कार अंग्रेज़ों ने 19 दिसमबर को 1927 को फांसी पर चढ़ा दिया। मुहम्मद हनीफ़ अहमद स्टेट कन्वीनर एम आर यू एफ़ ने मेहमानों का इस्तिक़बाल किया। इस जलसे में दो मिनट की ख़ामोशी मनाई गई।

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