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मुसलमानों के शादी, तलाक और गोद लेने के बारे में निजी कानूनों को चैलेंज

नई दिल्ली: सुप्रीमकोर्ट ने आज केंद्र को इस कमेटी की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है जो पहले मज़हबी माइनॉरिटीज सहित  मुसलमानों के शादी , तलाक़ और गोद लेने के बारे में निजी कानूनों के विभिन्न पहलूओं का जायज़ा लेने के मक़सद से बनाई गई थी। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर और जस्टिस यू यू ललित बेंच‌ ने ऐडीशनल सॉलिसिटर जनरल जो केंद्र की तरफ़ से हाज़िर हुए, अंदर छ: हफ़्ते रिपोर्ट अदालत में पेश करने को कहा। बेंच‌ ने माइनॉरिटीज मीनिस्टर‌ सायरा बानो नामी महिला दरख़ास्त का जवाब देने निर्देश दिया।

उन्होंने मुसलमानों में अक्सर शादी(Often marriage), तलाक अपरिवर्तनीय और निकाह हलाला जो विधि प्रचलित है उसके संवैधानिक औचित्य(Constitutional justification) को चैलेंज दी है।तलाक़ बाइन में कोई मुसलमान मर्द अपनी बीवी को पाकी की हालत में एक से ज़ियादा तलाक दे सकता है या फिर एक ही बार में वह तीन बार तलाक देकर बीवी को अपनी विवाह से निकाल‌ सकता है। इस बीच बेंच‌ ने जुडिशरी की रजिस्ट्री को इस मसले पर दरख़ास्त के न्यायिक रिकार्ड की नकल अंदरून छः हफ़्ते देने का निर्देश दिया। अदालत ने पहले एक अलग‌ आवेदन के रूप में इस का नोट लिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले महीने में सायरा बानो की दरख़ास्त पर केंद्र से जवाब तलब किया था जिसमें उन्होंने मुस्लिम पर्सनल ला ऐक्ट1937 की धारा 2 के संवैधानिक औचित्य को चैलेंज किया था। उन्होंने कहा कि इस बार के शादी, तलाक और निकाह हलाला को स्वीकार करके सही ठहराया गया है। अदालत ने इस मामले को भी ऐसी ही आवेदन के साथ गठबंधन किया था। सायरा बानो ने कहा कि उसे शौहर‌ और ससुराल वालों से दहेज की मांग और ज़ुल्म का सामना। उसे नींद की गोलियाँ दी गईं जिससे याददाश्त जाती रही और उसे बेहोशी की हालत में रखा गया। इन सब ने उसे बुरी तरह बीमार बना दिया और ऐसे नाजुक समय में उसके शौहर‌ ने तीन बार तलाक दे दिया।

दरख़ास्त गुज़ार ने मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 को चैलेंज किया और कहा कि यह भारतीय मुस्लिम महिला को एक से अधिक शादी से सुरक्षा करने में नाकाम रहता है। सायरा बानो ने अपनी दरख़ास्त  में कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ यौन भेदभाव मनमानी तलाक और पहली शादी के लिए संविधान ने जो सुरक्षा प्रदान की है उसका  लिहाज़  रखे बिना मुस्लिम शौहरों की दूसरी शादी का सुप्रीमकोर्ट की  ओर से जायज़ा लिया जाना चाहिए।

मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे हैं जबकि तलाक मामले में मर्दो सही इख़्तेयार‌ होता है और जब चाहे ऐसा कर सकता है। इस तरह का भेदभाव और असमानता को तीन बार तलाक ज़रिये व्यक्त होता है और आज के  21 वीं सदी में यह बिल्कुल पुराना लगता है। इसके अलावा एक बार औरत को तलाक देदी गई उसके बाद शौहर‌ ने अगर हालते नशे में तलाक दिया हो तब भी वह बीवी को तब तक बारी नहीं कर सकता जब तक औरत हलाल न हो जाए। उसके लिए महिला को दूसरे मर्द से शादी करनी होगी और फिर वह तलाक दे तो उसके बाद ही पहला शौहर‌ उससे शादी कर सकता है।

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