Thursday , December 14 2017

मुसलमानों के हालात नहीं बदले हैं : कुंडू

मुसलमानों के सामाजी, इक्तेसादी और सियासी पिछड़ेपन के हालात जानने के लिए तश्कील सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के अमल की हक़ीक़त को जानने के लिए प्रोफ़ेसर अमिताभ कुंडू की सदारत में बनी कमेटीइ ने अपनी आखिरी रिपोर्ट अक्लियती मामलों के

मुसलमानों के सामाजी, इक्तेसादी और सियासी पिछड़ेपन के हालात जानने के लिए तश्कील सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के अमल की हक़ीक़त को जानने के लिए प्रोफ़ेसर अमिताभ कुंडू की सदारत में बनी कमेटीइ ने अपनी आखिरी रिपोर्ट अक्लियती मामलों के वज़ारत को सौंप दी है |

इस रिपोर्ट में डाइवर्सिटी कमीशन बनाने के साथ-साथ कई सुझाव दिए हैं कमेटी का मानना है कि कई मामलों में सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू किए जाने का असर नज़र आ रहा है.

कुंडू ने कहा कि, “हमारी कमेटी का सुझाव है कि रिजर्वेशन से मुल्क में तब्दीली लाने की कोशिश की बहुत सी हदें हैं क्योंकि सरकारी सेक्टर में रोज़गार बढ़ नहीं रहा है बल्कि कम हो रहा है और रिजर्वेशन सरकारी सेक्टर तक महदूद है.”

उन्होंने कहा, “हमने सिफ़ारिश की है कि डाइवर्सिटी इंडेक्स की बुनियाद पर अगर हम कुछ इंसेटिव दे सकें और इस इंसेंटिव सिस्टम में निजी और सरकारी दोनों सेक्टरो को शामिल कर सकें तो उसका असर ज़्यादा कारगर साबित होगा.”

उन्होंने साथ ही कहा, “हमने सिफ़ारिश की है कि एक डाइवर्सिटी कमीशन बनाना चाहिए जिन इदारों ने डाइवर्सिटी को बनाकर रखा है, जिन्होंने अपनी तकर्रुरी में, फ़ायदे देने में अक्लियतों , एससी और एसटी का ख़्याल रखा है, की एक रेटिंग होगी | उस रेटिंग में जो ऊपर आएंगे उन्हें हुकूमत की ओर से कुछ छूट दी जा सकती है, कुछ उन्हें फंड दिए जा सकते हैं.”

प्रोफ़ेसर कुंडू ने कहा, “कि मुस्लिम फिर्के में ऐसे बहुत से पेशे हैं जिनमें वे एससी वाले काम करते हैं हमने कहा है कि उन्हें भी एससी के दर्जे में रखना चाहिए, उन्हें भी रिजर्वेशन देना चाहिए | एससी और एसटीके लिए जो क़ानून है (
SC and ST Atrocities Prevention Act 1989) उसके दायरे में मुस्लिम फिर्के को भी लाया जा सकता है.”

उन्होंने कहा, “रोज़गार के सेक्टर में मुसलमानों को लोन देने से ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं, उन्हें बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. तालीम के सेक्टर में भी मुस्लिम लड़कियां खासतौर पर 13 साल के बाद स्कूल छोड़ देती हैं, उसमें सुधार की ज़रूरत है.”

कुंडू ने कहा, “यह कहना तो ग़लत होगा कि हुकूमत ने सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू करने की कोशिश नहीं की है उन्होंने स्कीम बनाए हैं, उन्हें लागू किया है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि जो नतीजा हासिल होने चाहिए थे वे नहीं हुए.”

उन्होंने कहा, गुजरात में मुसलमानों में ग़रीबी की जो शरह है वह कौमी शरह से बहुत कम है, आधे से भी कम है लेकिन ऐसा नहीं है कि गुजरात की यह हालत अभी की ही है. आज से 10 साल पहले भी गुजरात में मुसलमानों में ग़रीबी बहुत ज़्यादा नहीं थी.”

प्रोफ़ेसर कुंडू ने कहा कि, “इसकी वजह तारीखी हैं और हमें देखना होगा कि मुस्लिम फिर्का किस तरह के रोज़गार कर रहा है वह किसान नहीं हैं, वह बिजनस कर रहा है, उनके पास कुछ तकनीकी सलाहियत वाली नौकरियां हैं, जिनकी बुनियाद पर उनकी आमदनी ठीक है और उनका खर्च (जिसकी बुनियाद पर ग़रीबी निकाली जाती है) भी ज़्यादा है.”

उन्होंने कहा, “दरअसल गुजरात में मुसलमानों की अच्छी चीज़ें हैं उसके लिए नरेंद्र मोदी को सेहरा नहीं दिया जा सकता और जो ख़राब हालात है उसके लिए भी उन्हें ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.”

कुंडू ने कहा, “अगर आप इख्तेलाफ को ज़हनी तौर पर पर देखें तो उसे मापने का कोई ज़रिया हमारी कमेटी के पास नहीं है हमने यह देखा कि मरकज़ के जो प्रोग्राम रियासती हुकूमत के मार्फ़त लागू होते हैं उनकी गुजरात में क्या हालत है?

उन्होंने कहा, “दो-तीन प्रोग्रामो में हमने देखा , जैसे कि स्कालरशिप के प्रोग्राम में गुजरात सरकार जो कर सकती थी उसने वह नहीं किया. इन मामलों में उसका मुज़ाहिरा दसरे रियासतों के मुकाबले कमज़ोर रहा.”

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