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मुसलमानो के प्रति मीडिया का दोहरापन क्यों ? डा॰ उमर फारूक

पूँजीवादी साम्राज्य की दृष्टि से इस समय उनके रास्ते की सबसे बडी रूकावट इस्लाम और मुसलमान हैं । इसलिये मीडिया में मुसलमानों के बारे में प्रस्तुत किये जाने वाले समाचार और विश्लेषण पक्षपात से मुक्त नहीं होते । इस्लाम को हिंसा का अलमबरदार और मुसलमानों को आतंकवादी साबित करने का कोई मौका मीडिया अपने हाथ से जाने नहीं देता । दुनियाँ में कहीं भी कोई हिंसक घटना होती है ,तो घटना की सच्चाई कुछ भी हो , अख़बारों और समाचार चैनलों के माध्यम से बिना किसी प्रमाण के या छान बीन के उसका आरोप किसी मुस्लिम नाम के ग्रुप पर रख दिया जाता है , और इसी मिथ्या के आधार पर अत्यन्त झूँठी कहानियाँ गढी जाती हैं । टीवी चैनल तो इस मामले में सब पर बाज़ी ले जाते हैं और बडी मामूली बातों ( जैसे कि हालिया की मालदा और पूर्णिया हिंसा) को ख़ूब नमक मिर्च लगाकर प्रस्तुत करते हैं लेकिन जब छानबीन के बाद सच्चाई सामने आती है (जैसे कि मालदा हिंसा पर वहाँ के मुख्यमंत्री का हालिया बयान) तो यही मीडिया उसे इस प्रकार ब्लैक आउट कर देता है, जैसे इसका कोई महत्व ही नहीं है ।

इसके विपरीत किसी घटना में हिंदू आतंकी संगठन के लिप्त होने के स्पष्ट संकेत भी मौजूद हों तो मीडिया इसपर आपराधिक चुप्पी साध लेता है । नांदेड बम धमाका , मालेगांव के धमाके, समझोता एक्सप्रेस धमाका, आरएसएस हेडक्वार्टर पर धमाका, मडगांव (गोवा) बम धमाकों की घटनायें इसके बदतरीन उदाहरण हैं , जिनमें सारे सबूतों के बावजूद राष्ट्रीय अख़बार और टीवी समाचार चैनल चुप साधे रहे ।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति इससे भिन्न नहीं है । ओकलाहामा में बम धमाके का ज़िम्मेदार एक अमेरिकी आतंकी था , लेकिन बग़ैर किसी छानबीन के मीडिया ने मुसलमानों के विरूद्ध एक तूफान खडा कर दिया । मुसलमानों की छवि एक आतंकवादी समुदाय की बना दी गई । कई बार प्रसार माध्यम मुसलमानों से सम्बंधित ऐसे विषय को बहस का मुद्दा बनाते हैं जिनका ख़ुद मुसलमानों के बीच कोई महत्व नहीं होता , लेकिन उन्हें इस प्रकार चर्चा और बहस का विषय बना दिया जाता है कि इस्लाम की दीनी (धार्मिक) आदेश और प्रतीक मज़ाक का निशाना बन जायें । उदारणस्वरूप , उत्तर प्रदेश के आरिफ और गुडिया का मुद्दा , जिसके सीधे प्रसारण के द्वारा ज़ी॰ टीवी॰ ने अपने टीआरपी में वृद्धि के लिये सभी नैतिक मूल्यों को रौंद दिया था ।

इस देश में प्रतिदिन न जाने कितनी महिलाओं की आबरू लूटी जाती है । कई घटनाओं में उनके निकटतन समबंधी इस घिनौने अपराध को अंजाम देते हैं । इनके समाचार अख़बारों और टीवी चैनलों के किसी कौने में भी स्थान पाने से वंचित रह जाते हैं । लेकिन मुरादाबाद के किसी गांव में एक मुस्लिम परिवार की बहू और ससुर के बीच होने वाली घटना इसी मीडिया में इतना अधिक महत्व पाती है कि इसपर कई दिनों पर टीवी चैनलों पर बहसे की जाती हैं और विभिन्न दृष्टिकोणों से उसपर प्रकाश डालकर उसे प्रचारित किया जाता है । यहाँ हमारा उद्देश्य इस घटना से इन्कार करना या इसकी बुराई करना नहीं है, बल्कि मीडिया के दौहरे रवैये को बताना हमारा उद्देश्य है ।
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Via: headline24.in
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