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मुसलमान गौपालन नहीं करते यह भ्रम रखने वालों को इस मुफ्ती-ए-आजम से मिलना चाहिए

गाय को कुछ लोगों ने धर्म और समूदाय में बांट रखा है। हिंदुत्वाद की राजनीति ने एक ऐसा भ्रम पैदा किया है जिससे कुछ लोगों को लगता है कि मुसलमान गौपालन नहीं करते हैं। मध्य प्रदेश के मुफ्ती-ए-आजम अब्दुर्रज्जाक खान कुछ ऐसे ही मुसलमानों में से हैं जो 1984 से गौपालन कर रहे हैं। आज भी इनकी गौशाला में आठ गायें हैं। यह उदाहरण उन लोगों के लिए है जो गाय को हिंदु या मुसलमान की नज़र से देखते है। मुफ्ती-ए-आजम अब्दुर्रज्जाक खान जैसे लोगों के लिए गाय न हिंदु है न मुसलमान। उनके लिए गाय बस गाय है जो उनको पौषटिक आहार देती है। वो गायों की सेवा करते है और गाय उनको दूध और दही देती है। अब्दुर्रज्जाक के लिए न तो गाय रंग केसरिया है और न हरा है।

अब्दुर्रज्जाक भोपाल से लगभग 20 किलोमीटर दूर इंदौर हाई-वे के पास तूमड़ा गांव के रहने वाले हैं। यहीं एक बड़ी-सी दारुल उलूम हुसैनिया मस्जिद है। यह मस्जिद मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक की 60 एकड़ निजी जमीन पर बनी है। मस्जिद कोई 24,000 वर्गफीट रकबे में बनी है। इसी मस्जिद के पास दुधारू जानवरों का एक बाड़ा है। इस बाड़े में तकरीबन 20-25 बकरियां, चार से पांच भैसें और करीबन सात-आठ गाये हैं। यहां गायों और दूसरे जानवरों का पालने का दस्तूर लगभग तीन दशकों से रहा है। गाय यहां की सबसे पूरानी रहवासी हैं।

दारुल उलूम हुसैनिया मस्जिद
दारुल उलूम हुसैनिया मस्जिद

अब्दुर्रज्जाक खुद बताते हैं कि जब वे सात-आठ साल के थे, तब उनके भाई ने 13 रुपए में एक गाय सहारनपुर (उत्तरप्रदेश) से खरीद कर लाई थी। तभी से उन्हें इनसे मोहब्बत हो गई। हालांकि, जब वे बड़े हुए तो पढ़ाई-लिखाई और दूसरे चीजों में मशरूफ हो गए। उसी दौरान वो भोपाल आए और फिर यहीं के होकर रह गए। वे कहते हैं कि मैं जहां भी रहा मगर गाय की खिदमत करने की मंशा मेरे मन में हमेशा बनी रही। इसी बीच 1984 में ऐसा वाकया हुआ कि गाय से मेरा नाता फिर जुड़ गया, जो आगे भी बदस्तूर बना रहा। मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक की उम्र अब करीब 93 साल की हो चुकी है।

मुफ्ती साहब के पांचवें नंबर के दामाद सूफी मुशाहिद उज्ज़मा खान उस वाकये के बारे में बताते हैं, जब उनका नाता दुबारा गाय से जुड़ा। उज्ज़मा खान मुताबिक, 1984 में मुफ्ती साहब की बेगम शम्शुन्निसा की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। उनकी किडनियां खराब थीं। डॉक्टरों ने सलाह दिया कि उन्हें गाय का दूध पिलाया जाए तो फायदा होगा। मुफ्ती साहब ने इस मशविरे से मुतमईन थे। उसके बाद उन्होंने अपने बेटे अब्दुल रक़ीब को बुलाकर कहा कि वो जाकर गाय खरीद लाए। उसके बाद पहली गाय को खरीद कर लाया गया। उसके बाद शम्शुन्निसा बेगम दो साल ही जिंदा रह पाईं, पर गायें हमेशा के लिए हमारे पास रह गईं। आज जो गायें इस गौशाला में हैं, वो सब उसी गाय की वंश हैं।

मुशाहिद बताते हैं कि शहर में गायों को पालने और रखने में दिक्कत होती थी। इसलिए हमने उन्हें यहां (तूमड़ा रोड की गौशाला में) ला दिया। उसके बाद हुसैनिया मदनी सोशल वेलफेयर सोसायटी के बैनर तले हमने यहां एक मदरसा भी शुरू किया। इसमें अभी करीब 200 बच्चे पढ़ते हैं। गायों और दूसरे जानवरों की देखभाल के लिए पांच परिवार यहां चौबीसों घंटे रहता है। गायों का दूध इन्हीं सबके काम आता है। कुछ बच गया तो मुफ्ती साहब के परिवार के लिए भोपाल भेज दिया जाता है। लेकिन दूध कभी बेचा नहीं जाता।

मुफ्ती अब्दुर्रज्जाक गाय के दूध को मुकद्दस (पवित्र) मानते हैं। वे कहते हैं कि हकीमी किताबों में लिखा है कि गाय के दूध में सिफा है। मुफ्ती साहब मौजूदा राजनीतिक माहौल पर अफ़सोस जताते हैं। वे कहते हैं कि लोगों में इल्म की बेहद कमी है। गुमराह लोगों की भीड़ बढ़ रही है। यही भीड़ मजहब के नाम पर लड़ने-लड़ाने में लगी हैं। अब तो ऊपर वाला ही इन्हें राह दिखा सकता है।

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