Friday , July 20 2018

‘मुस्लिम आबादी वाली सीटों को SC/ST कोटे में रिजर्व करना बंद करें सरकारें’

यूपी की सपा सरकार में मंत्री रहे और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फाउंडर मेंबर कमाल फारुखी ने आरोप लगाया कि जानबूझकर ऐसी सीटों को एससी/एसटी कोटे में आरक्षित कर दिया जाता है जहां मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है. राजनीति में मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व से जुड़े एक सवाल के जवाब में फारुखी ने कहा कि मुस्लिम आबादी वाली सीटों को आरक्षित करके प्रतिनिधित्व को और भी कम कर दिया जाता है.

फारुखी ने कहा कि मुसलमानों ने आज़ादी के बाद से अभी तक कभी भी अपनी अलग राजनीति करने की कोशिश नहीं की है. अभी तक ऐसा ही रहा कि मुसलमान अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों को अपना समर्थन देकर जिताता रहा. जो मुसलमान हिंदुस्तान में रुक गए थे उन्हें यहां के सेक्युलर नेचर पर भरोसा था और उन्हें हमेशा यही लगता था कि रिप्रजेंटेशन के मामले में उनके साथ भेदभाव नहीं होगा.

बेशक देश की सियासत में मुसलमानों को लेकर बहुत हो-हल्ला होता है. लेकिन हकीकत यही है कि आज़ादी के बाद से 2014 के लोकसभा चुनावों में सबसे कम 22 मुसलमान उम्मीदवार ही जीतकर संसद में पहुंचे थे. ये अब तक का सबसे छोटा नम्बर था. इससे पहले 1957 में 23 मुसलमान चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. लोकसभा में मुसलमानों की हालत को शायर मुनव्वर राणा का ये शेयर भी कुछ तंज भरे अंदाज में बंया करता है ̔ मुसाहिब की सफों में भी मेरी गिनती नहीं होती, यह वह मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था. ̓

इस बारे में एएमयू, अलीगढ़ के प्रोफेसर शकील समदानी का कहना है कि ̔ सिर्फ 1980-84 का ही वो दौर था जब मुसलमान 49 और 42 के बड़े नम्बर के साथ लोकसभा पहुंचे थे. लेकिन उसके बाद से यह नम्बर नीचे की ओर गिरता चला गया. 25 और 30 के आंकड़ों में यह नम्बर उलझकर रह गया. सिर्फ 1999 में एक बार जरूर 34 मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे. हालांकि अब उपचुनाव के बाद 16वीं लोकसभा में मुसलमानों की संख्या 24 हो गई है. एक मुस्लिम महिला भी चुनाव जीतकर संसद में पहुंच गई हैं. देश की 13.4 फीसदी आबादी वाले समुदाय की संसद में मौजूदगी महज 4.2 फीसदी रह गई. ̓

साभार- न्यूज़ 18

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