मुस्लिम छात्रों को कलाम और कसाब में अंतर बताने वाले RSS के अभियान को पर्सनल लॉ बोर्ड ने बताया शर्मनाक

मुस्लिम छात्रों को कलाम और कसाब में अंतर बताने वाले RSS के अभियान को पर्सनल लॉ बोर्ड ने बताया शर्मनाक
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोगी संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने खासतौर से देश के मुसलमान विद्यार्थियों को, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को एक ‘रोल मॉडल’ के तौर पर अपनाने के लिये प्रेरित करने के मकसद से मुहिम चलाई है. हालांकि ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक वरिष्ठ सदस्य ने इस अभियान को अपमानजनक करार देते हुए कहा है कि हमेशा से मुल्क के लिए कुर्बानी देने वाले हिन्दुस्तानी मुसलमानों को अपनी देशभक्ति साबित करने की जरूरत नहीं है.

आरएसएस के मुस्लिम मंच के संयोजक मुहम्मद अफजाल ने बताया कि उनके संगठन ने मुसलमान विद्यार्थियों में देशभक्ति की भावना को मजबूत करने और भविष्य में देश के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को उनके सामने रोल मॉडल के तौर पर पेश करने का अभियान चलाया है. इस सवाल पर कि आखिर इस मुहिम की जरूरत क्यों पड़ी, अफजाल ने कहा कि हम मुस्लिम विद्यार्थियों के सामने इस बात को रखना चाहते हैं कि आखिर उनका रोल मॉडल कौन होगा. कलाम या (आतंकवादी अजमल) कसाब? हम दोनों के बीच के अंतर को सबके सामने रखते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि कई बार मुसलमान कहीं ना कहीं कसाब की तरफ भटक जाते हैं. हम उन्हें कलाम की तरफ लाना चाहते हैं. इससे देश और समाज तरक्की करेगा.’

ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य मौलाना यासीन उस्मानी ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तथाकथित मुस्लिम संगठन से और क्या उम्मीद की जा सकती है. ये लोग एपीजे अब्दुल कलाम को सामने रखकर चीजों को बेहतर नहीं बनाना चाहते, बल्कि यह जताना चाहते हैं कि मुस्लिमों के बारे में उनकी क्या राय है. वे मुसलमानों की नयी नस्ल को एहसास कराना चाहते हैं कि तुम किस पायदान पर खड़े हो. उन्होंने कहा कि जिस कसाब को उसके मुल्क के मुसलमानों ने अपने यहां दफनाने की जगह नहीं दी, उसे वह अपना रोल मॉडल कैसे मान सकते हैं. हिन्दुस्तान की आजादी में मुसलमानों के योगदान को कभी फरामोश नहीं किया जा सकता. मुस्लिमों ने स्वतंत्रता की लड़ाई को धर्मयुद्ध की तरह लड़ा था. अब उनके देशप्रेम पर सवालिया निशान लगाने वाले अभियान शर्मनाक हैं.

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