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मुस्लिम जंग पुल के नीचे गैर मजाज़ क़ब्ज़े

मुस्लिम जंग पुल मुख़्तलिफ़ कुतुब के हवाले से निज़ाम शशम मीर महबूब अली ख़ान के दौर में 21 शवाल 1318, सन 1901 ई.

मुस्लिम जंग पुल मुख़्तलिफ़ कुतुब के हवाले से निज़ाम शशम मीर महबूब अली ख़ान के दौर में 21 शवाल 1318, सन 1901 ई. को ग़ालिबुल मुल्क की निगरानी में पुल की तामीर हुई उस वक़्त महाराजा किशन प्रशाद मदारुल महाम थे। दूसरी कुतुब के मुताबिक़ नवाब ग़ालिबुल मुल्क ने 19 ज़िलहिज्जा 1311 हिजरी क़ो अपने ज़ाती ख़र्च से उस की तामीर शुरू की और 21 शवाल 1318 हिजरी क़ो तामीर ख़त्म हुई।

अफ़ज़ल गंज पुल के नमूने पर इस पुल को तामीर किया गया। आली हज़रत हुज़ूर निज़ाम ने 15 मुहर्रम 1319 हिजरी क़ो शाम 5 बजे इस पुल का इफ़्तिताह किया था। क़ारईन आप क़दीम शहर के किसी भी रास्ते से गुज़र जाईए तो आप को कुछ कहने बोलने या बताने की ज़रूरत नहीं होगी। बल्कि आप ख़ुद इस बात को महसूस करेंगे और इस पर आप को अफ़सोस भी होगा कि हम तारीख़ी इमारतों का तहफ़्फ़ुज़ तक ना कर सके।

ख़ूबसूरत इमारतों से मुत्तसिल गैर मजाज़ क़ब्ज़ों ने तारीख़ी इमारतों की ख़ूबसूरती को बिगाड़ कर रख दिया है। शहरी इमारतों का जायज़ा लेते हुए जब आप शहर के पुलों से गुज़रेंगे तो ये एहसास और भी बढ़ जाएगा कि हुक्काम की ग़फ़लत और लापरवाही के बाइस पुलों को तक बख्शा नहीं जा रहा है और उन के ऊपर भी और नीचे भी नाजायज़ क़ब्ज़े और गैर कानूनी काम हो रहे हैं।

किसी पुल के नीचे जूए के अड्डे हैं तो किसी पुल के ज़ेरे साया कुछ अफ़राद अपना मस्कन बनाए मुख़्तलिफ़ गैर कानूनी सरगर्मियों में मुलव्विस हैं। उस की एक ताज़ा मिसाल मुस्लिम जंग पुल के तारीख़ी पुल के नीचे गैर मजाज़ क़ब्ज़ों की है। इस से बल्दिया बिलकुल बेख़बर है। यक़ीनन इस ज़ोन के बल्दिया के ओहदेदार इस पुल से ज़रूर गुज़रते होंगे लेकिन उन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती और यहां मुहावरा चिराग़ तले अंधेरा सादिक़ आता है।

एक मख़सूस तबक़ा पहले ही पुराना पुल पर मुकम्मल क़ब्ज़ा कर चुका है और अब मुस्लिम जंग पुल के नीचे क़ब्ज़े शुरू हो चुके हैं। राक़िमुल हुरूफ़ के मुशाहिदा के मुताबिक़ पुराना पुल पर 95 दुकानात गैर कानूनी तौर पर क़ायम हो चुके हैं। दिलचस्प बात ये है कि मुक़ामी पहलवान दुकानदारों से रोज़ाना 20 ता 50 रुपये किराया भी वसूल करता है।

गुज़िश्ता चंद दिनों से मुस्लिम जंग पुल के नीचे लोग झोंपड़ीयाँ डाल कर वहीं मुक़ीम हैं। आज ये झोंपड़ीयाँ हैं जो कल पुख़्ता मकानात में तब्दील हो सकते हैं। ये हक़ीक़त है कि अगर बुनियादें खोखली होने लगीं तो इमारत का वजूद ख़तरा में होता है लिहाज़ा हुक्काम को चाहीए कि वो इन क़ब्ज़ों को फ़ौरी बर्ख़ास्त करने पर तवज्जा दें और पुल की ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा के लिए वहां चमनिया पार्क तामीर किये जाएं इस तरह उन की ख़ूबसूरती को क़ायम और दाइम रखने में मदद भी मिल सकती है वर्ना साँप गुज़रने के बाद लाठी पीटने का क्या फ़ायदा। ———————— अबू ऐमल

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