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मुस्लिम नेचुरालिस्ट सलीम अली हैं “बर्ड मैन ऑफ़ इंडिया”

अस्सलाम ओ आलेकुम,

सिआसत हिंदी आज आपको बताएगा एक ऐसे साइंटिस्ट-नेचुरालिस्ट के बारे में जो हिन्दुस्तान की शान हैं. दुनिया भर में अपने काम का लोहा मनवाने वाले सलीम अली ने पर्यावरण के लिए जो काम किया वो क़ाबिले तारीफ़ ही रहा है.

सलीम मोइज़ुद्दिन अब्दुल अली “सलीम अली” की पैदाइश 12 नवम्बर 1896 को बॉम्बे में हुई. सलीम अली हिन्दुस्तान के सबसे बड़े ओर्निथोलोजिस्ट माने जाते हैं और इसी वजह से इन्हें “बर्ड मैन ऑफ़ इंडिया” भी कहा जाता है. उन्होंने अपने दम पर कोलादेओ नेशनल पार्क (भरतपुर बर्ड सैंक्चुअरी) के लिए हुकूमत से समर्थन हासिल किया.

सलीम अली की शुरूआती पढ़ाई मुंबई में हुई लेकिन कॉलेज में पहले साल के बाद ही उन्हें तवोय(बर्मा) भेज दिया गया. आस पास के जंगलों की मौजूदगी ने सलीम को मौक़ा दिया कि वो प्रकर्ति को समझें. 7 साल बाद 1917 में जब वो भारत वापिस आये तो उन्होंने अपनी पढ़ाई को आगे जारी रखा और डावर कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में कमर्शियल लॉ और एकाउंटेंसी की पढ़ाई करने लगे लेकिन उनका दिल कभी इन मौजूंआत पर नहीं लगा, फ़ादर एथेल्बर्ट ब्लैटर ने उनके जीव विज्ञान में रुचि को पहचाना और उन्हें जूलॉजी की ही पढ़ाई करने को कहा. इसके बाद सलीम ने सुबह डावर कॉलेज में क्लास की तो शाम को वो जूलॉजी पढने के लिए सेंट ज़ेवियर कॉलेज में पढ़ाई की. 1918 में उनकी शादी तहमीना अली से हो गयी. इसके बाद कुछ साल वो जर्मनी में रहे. 1930 में वहाँ से वापिस आने के बाद उन्होंने माटिंग सिस्टम के बारे में बताया.

salim

उनकी किताब “दा स्टडी ऑफ़ इंडियन बर्ड्स” उनकी सबसे मशहूर किताब है. उन्होंने कई जर्नल आर्टिकल्स लिखे जिसमें “जर्नल ऑफ़ दा बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री” भी शामिल है, इन किताबों और जर्नल के कामयाब होने का श्रेय वो अपनी बीवी तहमीना अली को देते हैं.

उन्हें 1958 में पद्मा भूषण से नवाज़ा गया जबकि 1976 में उन्हें पद्माविभूषण से नवाज़ा गया.

90 साल की उम्र में 20 जून 1987 को बॉम्बे में उनका इन्तेक़ाल हो गया.

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