Sunday , December 17 2017

मुस्लिम शादीयों में ग़ैर इस्लामी रसूमात राजपूताना समाज की दैन

हैदराबाद १५अक्टूबर (रास्त) मुस्लिम मुआशरा (सभ्यता)में मसह बिकती दौड़, नुमाइश, शान-ओ-शौकत, इमारत पसंदी का मुज़ाहरा और ताय्युशात पसंदी का बढ़ता रुजहान और दीगर तमाम ख़राबियां इस लिए पैदा होरही हैं कि हम उसो-ए-हसना से दूर हो चुके हैं, हम

हैदराबाद १५अक्टूबर (रास्त) मुस्लिम मुआशरा (सभ्यता)में मसह बिकती दौड़, नुमाइश, शान-ओ-शौकत, इमारत पसंदी का मुज़ाहरा और ताय्युशात पसंदी का बढ़ता रुजहान और दीगर तमाम ख़राबियां इस लिए पैदा होरही हैं कि हम उसो-ए-हसना से दूर हो चुके हैं, हमारा समाज हमारा तर्ज़ (शैली) हयात बदल गया।

हम दीन से नाबलद हैं, इस्लाम हम से किया चाहता ही, इस्लामी तौर तरीक़े और तर्ज़ (शैली)मुआशरत किया ही, हम इस से वाक़िफ़ नहीं हैं। प्रोफ़ैसर मजीद बेदार ने 13 अक्टूबर बरोज़ हफ़्ता मसदोसी हाल मग़लपुरा मैं बज़म जौहर के मुज़ाकरे में इन ख़्यालात का इज़हार करते हुए मुस्लिम मुआशरा की शादीयों में ग़ैर इस्लामी ग़ैर शरई राजपूताना रस्म-ओ-रवायात के बढ़ते हुए रुजहान(रुचि) की सख़्त मुज़म्मत की और कहाकि शादीयों में ग़ैर ज़रूरी इसराफ़, नमूद-ओ-नुमाइश, लाईटिंग, वीडियोग्राफी, बड़े बड़े कॉरपोरेट शादी ख़ानों में शादी की तक़ारीब के इनइक़ाद, घोड़े जोड़े और जहेज़ तलबी को ग़ैर इस्लामी और ग़ैर शरई क़रार दिया और ऐसी तमाम शादीयों के बाईकॉट की अपील की।

जनाब मुहम्मद अली हुसैनी सरपरस्त अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू अज़ीम तर हैदराबाद ने अपने सदारती ख़िताब में मुस्लिम मुआशरे में ग़ैर इस्लामी ग़ैर शरई रसूमात को असर-ए-हाज़िर की देन और दीन और इस्लामी तालीमात से दूरी क़रार दिया और कहाकि इस्लाम ने कहाकि निकाह को इस क़दर आसान क्रुद्व कि ज़ना मुश्किल हो जाई। जनाब आबिद अली ख़ान ने कहाकि दीनी तालीम के बगै़र इस्लाह मुआशरा का तसव्वुर नहीं किया जा सकता।

मुनीर उद्दीन मुजाहिद ने कहाकि बगै़र देन लेन घोड़े जोड़े की शादीयों को रिवाज देना होगा। शादीयों में ग़ैर इस्लामी रसूमात, रवायात के ख़िलाफ़ मुनज़्ज़म और मुत्तहदा जद्द-ओ-जहद और अमली इक़दामात ज़रूरी हैं। ऐसी शादीयों में शिरकत (शामिल‌)से गुरेज़ ज़रूरी है जहां देन लेन घोड़े जोड़े और जहेज़ तलबी पुर इसरार होता है।

इस्लामी तर्ज़ की शादीयों की इबतदा-ए-अपने लड़कों की शादीयों से करें। जनाब नादिर अलमसदोसी ने कहाकि मुस्लिम मुआशरे की शादीयों से मुताल्लिक़ इन्क़िलाबी अमली इक़दामात की ज़रूरत है। जनाब मसऊद फ़ज़ली ने कहाकि जहेज़ दरअसल तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का दूसरा नाम मुस्लिम समाज में हिन्दू रस्म-ओ-रिवाज शामिल हो गए हैं।

डाक्टर राही ने कहाकि बर्र-ए-आज़म (भूमन्डल‌)के दौर से ही राजपूताना रस्म-ओ-रिवाज मुस्लिम मुआशरे का जज़ोलाएनफ़क बन कर रह गए हैं। इबतदा-ए-में हज बैतुल्लाह को रवानगी की मुसर्रत में प्रोफ़ैसर मजीद बेदार, डाक्टर जावेद कमाल, फ़रीद सह्र, डाक्टर फ़रीद सादिक़ की गलपोशी की गई। अस्थाना सह्र की सदारत (सभापत्तिव‌)में मुशायरा हुआ। मुशायरा में असर ग़ौरी, अंजुम शाफ़ई, रूबीना शबनम बुख़्तियार और दूसरों ने कलाम सुनाकर दाद (प्रशंसा)हासिल की। डाक्टर राही ने निज़ामत (प्रबंन्ध करना)की और शुक्रिया अदा किया।

TOPPOPULARRECENT