Tuesday , September 25 2018

मूर्ख बनने से पहले आर्थिक रूप से शिक्षित बनो- रविश कुमार

फ़ोटो- फेसबुक

38 विलफुल डिफॉल्टरों के 500 करोड़ रुपये का एनपीए write off कर दिया गया है. इसका मतलब यह हुआ कि बैंक ने अपने मुनाफे से एनपीए के खाते में पैसा डाला और एनपीए के खाते में नुकसान कम दिखने लगा. इसका मतलब यह नहीं हुआ कि जिसने लोन लिया था, उसे माफ कर दिया गया. ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ ने यह ख़बर 6 नंबर के पन्ने पर कहीं कोने में छापी है, जबकि पहले पन्ने पर पहली ख़बर बैंकों के एनपीए पर ही है. एनपीए मतलब नॉन परफॉर्मिंग असेट्स, यानी जो लोन लिया गया है, वह चुकाया नहीं गया. हम यह कभी नहीं जान पाएंगे कि एक तरह की माफी का आधार क्या रहा होगा. राजनीतिक पसंद या कुछ और.

पिछले तीन साल में 21 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से 11 बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक ने prompt corrective measures (PCA) के तहत रखा है. यह एक किस्म की निगरानी व्यवस्था है. ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ की ख़बर है कि 5 और बैंक इस निगरानी के तहत आने की कगार पर खड़े हैं, क्योंकि इनका एनपीए कुल लोन का 6 प्रतिशत से भी ज़्यादा हो गया है. जब दो साल तक बैंकों के पास कैश की उपलब्धता कम हो जाए, अपनी संपत्ति पर रिटर्न कम होने लगे और एनपीए बढ़ जाता है, तब उन्हें पीएसी के तहत रखा जाता है.

पिछले पांच साल में भारत सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक में करीब दो लाख करोड़ रुपये डाले हैं. ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ में दिए गए चार्ट के मुताबिक भारतीय स्टेट बैंक का नेट वर्थ है 1,567,004 करोड़, जबकि सरकार ने एनपीए से बचाने के लिए पैसे डाले हैं 190,480 करोड़ रुपये. कुल छह बैंक ऐसे हैं, जिनमें 60,000 करोड़ से ज़्यादा रकम डाली गई है. जो लोग लोन ले गए, उनका कुछ नहीं हुआ. उनके बदले सरकार पैसे डाल रही है. जनता का पैसा लेकर कोई पहले गायब हो जाए और फिर सरकार जनता के पैसे से ही भरपाई करे. गेम समझ तो आएगा नहीं, इसलिए गेम देखते जाओ.

18 राज्यों के औसत शिक्षा बजट से भी कम गुजरात ने 2018-19 के लिए बजट आवंटित किया है. कुल बजट का 13.9 प्रतिशत. अपने पिछले बजट से काफी कम किया. कृषि पर भी गुजरात ने 18 राज्यों के औसत से कम बजट का प्रावधान किया है. औसत है 6.4 प्रतिशत, गुजरात का कृषि बजट है कुल बजट का 3.3 प्रतिशत.

87 करोड़ बैंक खातों को आधार से जोड़ने की ख़बर आई है. आधार को अनिवार्य बनाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. जब सब जगह आधार हो ही गया, तो इस सुनवाई की क्या उपयोगिता रह जाएगी. कम से कम सुनवाई के दौरान तो रोक होनी चाहिए थी. वैसे इन सब आंकड़ों से प्रभावित होने से पहले दो बातें सोच लें. आज जनधन खाते आंकड़े बनकर आपकी ज़िन्दगी में कामयाबी के प्रतीक तो बन गए हैं, मगर इनका बड़ा हिस्सा निष्क्रिय हो चुका है. वही हाल अटल पेंशन योजना का है. अगर सरकार यही बता दे (ईमानदारी से) कि योजना शुरू होने के बाद कितने बंद हो गए, लोग दूसरा प्रीमियम नहीं दे पाए, तो आंकड़े लड़खड़ा जाएंगे.

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