मेघालय में बरक़रार 40 सालों की परंपरा, किसी को नहीं मिला पूर्ण बहुमत

मेघालय में बरक़रार 40 सालों की परंपरा, किसी को नहीं मिला पूर्ण बहुमत
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मेघालय में हुए 1972 की पहली विधानसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो लगातार नौ चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. 1978 के बाद से अब तक हुए सभी 9 चुनावों में कांग्रेस लगातार सबसे बड़ी पार्टी रही है. राज्य की 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें 2013 में मिली जो 31 के स्पष्ट बहुमत से दो कम है.

हालांकि इस बार भी कांग्रेस में अब तक सबसे अधिक सीटें हैं. लेकिन 2018 विधानसभा चुनावों में सबसे बड़े विजेता के रूप में  पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा द्वारा स्थापित एनपीपी है. संगमा को 2012 में एनसीपी से निष्कासित कर दिया गया था. 2013 में एनपीपी को केवल 2 सीटें ही मिली थी लेकिन 2018 में कांग्रेस को मिली 21 सीटों से महज दो कम 19 सीटें मिली है. एनपीपी ने इस बार कांग्रेस पार्टी से 11 सीटें छीन ली हैं.

पहले के कई चुनावों की तरह इस बार भी क्षेत्रीय पार्टियां और निर्दलीय सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका में होंगे. यूडीपी गठबंधन को पिछले चुनाव (13) के मुकाबले 8 सीटें मिली हैं, लेकिन वह किंगमेकर की भूमिका में हो सकते हैं. मेघालय में तीन मुख्यमंत्री यूडीपी से रहे हैं.

मेघालय की राजनीति में निर्दलीय ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. पहली मेघालय विधानसभा में 60 में से 19 निर्दलीय उम्मीदवार थे और पिछले चुनाव में 13 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी. 2001 निर्दलीय उम्मीदवार राज्य के मुख्यमंत्री बने. सोहरा से जीते निर्दलीय विधायक फ्लिंडर एंडरसन खोंगलाम भी राज्य के मुख्यमंत्री होने के पहले निर्दलीय थे. 1983 की तरह 2018 में भी 3 निर्दलीय उम्मीदवार जीतकर आए हैं. वे राज्य में सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.


भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का इस बार मेघालय में वोट शेयर के लिहाज से अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. बीजेपी को लगभग 10% वोट मिले हैं.  2003 में बीजेपी को 5.4% वोट मिले थे. हालांकि, सीटों की गिनती में यह अभी कम (2) है. बीजेपी को 1998 में सर्वाधिक तीन सीटें हासिल हुई थीं. बीजेपी के दोनों विधायक चुनाव से पहले ही पार्टी में शामिल हुए थे.

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