Saturday , January 20 2018

मोदी को बधाई अब रंग लाई :डॉ० वेदप्रताप वैदिक‌

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मोदी को बधाई : अब रंग लाई

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

बिहार की हार पर जब मैंने नरेंद्र मोदी को हार्दिक बधाई दी थी तो मेरे पास दुनिया भर से सैकड़ों मित्रों के संदेश आए। उस लेख को पाठकों ने लाखों लोगों को आगे भी भेजा। उस समय तो लग रहा था कि मैंने मोदी के गहरे घाव पर नमक छिड़क दिया है लेकिन मैं जानता था कि बिहार की हार मोदी, भाजपा और भारत के लिए बहुत ही हितकर सिद्ध होगी। वह निष्कर्ष अब सही सिद्ध होता दिखाई पड़ रहा है।

पहली बात तो यह हुई कि बिहार के बाद अब राजनीति में थोड़ी रोचकता का समावेश हुआ है, विविधता का भी। नरेंद्र मोदी के भाषण ‘बहनों और भाइयों’ सुनते−सुनते सारा देश थकने लगा था। टीवी चैनलों और अखबारों में रोज़−रोज़ एक ही चेहरा देखकर मोदीप्रेमी भी ऊबने लगे थे। कोई महाबोर आदमी भी रोज़ एक ही कमीज़ नहीं पहने रह सकता। सो, अब कई चेहरे दिखाई पड़ने लगे हैं। कई गंभीर हैं और कई सुंदर! कभी गृहमंत्री राजनाथसिंह दिखाई पड़ते हैं तो कभी विदेशी मंत्री सुषमा स्वराज। कभी अरुण जेटली तो कभी प्रकाश जावड़ेकर। लगता है, मंत्रियों में नए उत्साह का संचार हुआ है। राजनाथजी संसद में जमकर मोर्चा संभाले हुए थे और सुषमाजी ने इस्लामाबाद में भारतीय विदेश नीति के झंडे ही गाड़ दिए। इधर जेटली ने जीएसटी पर पहल की तो उधर जावड़ेकर ने पेरिस में भारतीय पक्ष की जमकर वकालत की। नितिन गडकरी तो अपने रचनात्मक काम के लिए जाने ही जाते हैं। वे भी खबरों में दिखाई पड़े। कहने का मतलब यह कि बिहार ने मोदी को सिखाया कि लोकतंत्र में मंत्रिमंडल की जिम्मेदारी व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक होती है। प्रधानमंत्री ‘बॉस’ नहीं होता, बल्कि ‘बराबरीवालों में प्रथम’ (प्राइमस इन्टर पेयर्स) होता है। इस पद्धति पर चलनेवाली सरकार मजबूत और स्वस्थ होती है और उसमें सभी प्रतिभाओं का सही इस्तेमाल हो सकता है ।

 

दूसरी बात बिहार की वजह से यह हुई कि अपनी सरकार के ‘सर्वज्ञ’ और ‘सर्वशक्तिमान’ नेतागण विरोधी नेताओं को ससम्मान बुलाकर उनसे बात करने लगे। उस बात का चाहे कोई ठोस परिणाम न निकले लेकिन लोकतंत्र की गाड़ी सिर्फ एक पहिए से नहीं चल सकती। यदि बिहार जीत जाते तो एक टांग की दौड़ जारी रहती, जिसका अंजाम आखिरकार आपात्काल से भी बुरा होता। इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार का सारा काम−काज ठीक−ठाक चल पड़ा है। आज भी संघ और भाजपा के साधारण कार्यकर्त्ताओं से शीर्ष नेतृत्व कटा−कटा रहता है और सांसदों का दम घुटा−घुटा−सा रहता है। नौकरशाहों के दम पर कोई भी लोकतांत्रिक सरकार कितने दिन चल सकती है? जिस लहर पर सवार होकर यह सरकार बनी थी, वह उतर चुकी है। अब जरुरी है कि नेतागण भी हवा में उड़ने की बजाय जमीन पर चलना शुरु करें। उन्हें जमीन पर चलाने के लिए अब किसी नई दिल्ली या नए बिहार की जरुरत नहीं होनी चाहिए।

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