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“मोदी मेहरबान, तो चमचा पहलवान”; बीजेपी राज में लौटा चमचों का ज़माना

चमचों और खेत में उगने वाले खरपतवार में एक बात सामान होती है। दोनों वहां पाये जाते हैं जहाँ वो मुफ्त में पड़े खा सकें।

खरपतवार जहाँ फसल के साथ पैदा हो फसल को मिल रही खाद का पूरा फायदा लेते हैं वहीँ चमचे अपने साहब के तलवे चाट और उसकी गुलामी कर चमचागिरी का धर्म निभाते हैं और बदले में मालिक से उन्हें मिलती है इलेक्शन टिकट, इलेक्शन हारने के बाद भी मंत्री पद, जेड या जेड प्लस सिक्योरिटी और न जाने क्या क्या। चाहे चमचागिरी करवाना हर किसी को पसंद न हो क्यूंकि आज भी देश में आज भी ऐसे बहुत से ऐसे लोग हैं जो ऊँचे और फायदा देने वाले पदों पर विराजमान होने के बावजूद चमचों की बजाये हाथ से ही खाना पसंद करते हैं।

जबकि कुछ लोग वो हैं जो हर वक़्त चमचों से ही घिर रहना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों में से एक तो आज देश के सबसे ताकतवर लोगों में जगह बना चुका है। ऐसे में माहौल यह है कि अगर आप उस शख्श के खिलाफ कुछ कहने की कोशिश भर भी करते हैं तो चमचों की फ़ौज आपकी “माँ-बहन एक करने में” कोई कसर नहीं छोड़ते। खैर इन छोटे चमचों को आजकल आईटी सेल कार्यकर्ता के नाम से भी जाना जाता है। ये छोटे चमचे तो खैर आम जनता को डराने धमकाने और अपने साहब का मान सम्मान बढ़ाने का काम करते हैं अब आते है साहब के बड़े चमचों की और जो साहब के लिए बड़े-बड़े काम करते हैं और बदले में बड़ा इनाम भी पाते हैं। ऐसे ही चमचों का ज़िक्र किया था बहुजन समाज पार्टी के लीडर बाबू कांशीराम ने 1982 में लिखी अपनी एक किताब “द चमचा एज” में इस किताब के जरिये कांशीराम जी ने दलित शोषित समाज को अपने समाज में पल बढ़ रह रहे चमचों से होशियार रहने की बात कही थी। इस किताब में बड़े  ही अच्छे से बताया गया है कि कैसे समाज में रहने वाले यह चमचे जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद कर अपने साहब के प्रति वफादारी निभाते हैं।

आज के दौर की अगर बात करें तो बाबू कांशीराम की लिखी बातें देश के मौजूदा हालातों पर बिलकुल फिट बैठती हैं। देश के नेताओं ने इशारों पर काम करने वाले चमचे देश बेचने से लेकर लोगों को भड़काने और मूर्ख बनाने का हर काम बखूबी कर लेते हैं। फिर चाहे वो काम नाजायज़ हो या बिलकुल ही नाजायज़ इन चमचों को ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता।

ऐसे ही कुछ स्वयंभू चमचे जो पिछले वक़्त में अपने साहब के प्रति वफादारी निभा आज कामयाबी की राह में आगे निकल चुके हैं या आगे निकलने की ख्वाहिश लिए बैठे हैं अपने फायदे के लिए किसी भी हद्द तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। ऐसे में मामला चाहे उड़ते पंजाब पर कैंची चला लोगों से सच छुपाने का हो, जेएनयू मामले में सरकार के इशारों पर रटे-रटाये भाषण देने का हो या कुछ और चमचों की फ़ौज हर वक़्त तैयार है।

2014 के इलेक्शन से पहले देश में UPA-II सरकार को हर तरफ से घेरने वाले चमचे जिनमें से बाबा रामदेव ख़ास तौर पर आगे थे आज काले धन के बारे में ब्यान देने से पहले ही शवासन लगा लेते हैं। अब न तो चमचों को बढ़ती महंगाई सताती है और न ही पेट्रोल डीजल की बढ़ी कीमतें उल्टा चमचे तो हमेशा यही कहते नज़र आते हैं कि देश बदल रहा है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि देश क्या 2014 के बाद से ही बदलना शुरू हुआ है? देश में परमाणु ऊर्जा समझौते होने से पहले देश का ढांचा उस लायक बना होना जरूरी है। जाहिर सी बात है पिछले 65 सालों में हुए विकास ने ही हमें आज इस मुकाम पर लेकर खड़ा किया है कि आज हम परमाणु ऊर्जा समझौतों की और एनएसजी में शामिल होने की बात कर रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि पुराना वक़्त बहुत अच्छा था लेकिन यह कहना तो ठीक होगा कि वो दौर कम से कम चमचों का तो नहीं था और सरकार को अपने काम पूरे करने के लिए चमचों का सहारा तो नहीं लेना पड़ता था।

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