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मोदी सरकार का “मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया” जैसे नई बोतल में पुरानी शराब- लालू प्रसाद यादव

30 साल बाद केंद्र में प्रचंड बहुमत से आई केंद्र सरकार आज अपने दो साल पूरे कर रही है| विगत दो साल में सरकार की कोई उपलब्धि नहीं है, ज़मीन स्तर पर कहीं कोई ठोस परिणाम नहीं| केंद्र सरकार चुनावी वायदों को पूरा करने में असमर्थ होने के साथ भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा करने में भी असमर्थ रही है|

कोई आज से ढाई- तीन साल पहले देश में ऐसा माहौल बनाया जाने लगा की मानों देश निराशा के दलदल में धँसता जा रहा है, और इस निराशा के मन्ज़र में केवल गुजरात ही है जो आशा और सकारात्मक ऊर्जा से ओत प्रोत है। पहली बार किसी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने अपनी जाति और चाय बेचने के प्रपंच को भुनाया, और ऐसा करके पिछड़े और ग़रीब तबके के उम्मीद को अपनी सत्ता तक के सफ़र के ईंधन में तब्दील कर दिया। गरीबों के अच्छा जीवन जी पाने की लालसा का मज़ाक बनाते हुए सबको 15-15 लाख रु देने का सपना दिखाया गया। गाँव-मोहल्ले में भाजपा के कार्यकर्ता जा जा कर 15-15 लाख मिलने का भरोसा जगाते थे। सोचिए, ग़रीबों की ग़रीबी का कितना बेहूदा मज़ाक बनाया गया! 100 दिनों में काला धन लाने की गगनचुम्बी बातें करते थे, अब उल्टा हो रहा है देश के मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई का सफ़ेद धन विदेश जा रहा है और बेबस सरकार अफ़सोस जताती है कि हम क्या करें?

महँगाई तो रत्ती भर भी कम नहीं हुई, उलटे दालें सचमुच मुर्गी के बराबर महँगी हो गई! युवाओं को सालाना दो करोड़ नौकरियां देने के ताबड़-तोड़ सपनें बेचे गए| टीवी पर पता नहीं कैसे-कैसे अवास्तविक और भ्रामक विज्ञापन दिखाकर लोगों को ठगा गया, झूठे और अनर्गल प्रचार की सभी सीमाएं तोड़कर युवाओं को बनावटी बातों में उलझाया गया। आर्थिक विकास के नाम पर किसानों के साथ छलावा किया जा रहा है। विकास के नाम पर पूंजिपतियों की जोरदार तरफदारी हो रही है। गरीब-गुरबा और मध्यमवर्गीय देशवासियों को विकास के बड़े-बड़े आसमानी सपने दिखाकर मोदी सरकार अब विकास की नहीं विनाश की बात कर रही है। किसान कर्ज और वादों के गम के मारे आत्महत्या कर रहे है| देश में किसानों की बढ़ती आत्महत्याएं एक गहरे कृषि संकट का लक्षण हैं | जब अन्न को पैदा करने वाले अन्नदाता ही नहीं होंगे तो आप समझ सकते हैं कि स्थिति कितनी गंभीर होगी लेकिन केंद्र सरकार किसानों की हालत के बारे में बिल्कुल भी तत्पर और गंभीर दिखाई नहीं देती। विदेशी कंपनियों के लिए रेड कार्पेट बिछाया जा रहा है, जबकि अन्नदाताओं के लिए यह सरकार बिजली,पानी,बीज और खाद का भी प्रबंध नहीं कर पा रही है।

कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण विभागों से धन आवंटन को कम किया जा रहा ताकि गरीब, वंचित ना तो अपना ढंग से ईलाज करवा पाएँ और ना ढंग की शिक्षा ग्रहण कर पाएँ। विगत दो वर्ष में पूरी केंद्र सरकार दल बल और छल के साथ छात्र राजनीति में कूद गई। केंद्र आरएसएस के दक्षिण पंथी विचारधारा को शिक्षण संस्थानों पर थोपने की एक सूत्री ज़िद पर अड़ी है। विगत दो वर्ष में दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार में अचानक उछाल आया। भुखमरी, ग़रीबी, कुपोषण से ज्यादा अहमियत छद्म राष्ट्रवाद जैसे नारे को दी जा रही है| बात बात पर देशद्रोही और देशप्रेमी के प्रमाणपत्र बंटने लगे है । प्रधानमंत्री बारहों मास चुनावी मोड में तो सरकार और एक बड़ा वर्ग चापलूसी के मोड में नज़र आता रहा। एक से एक ज़हरीले नेता समय समय पर साम्प्रदायिक ज़हर उगलने लगे। कभी लव जिहाद तो कभी घर वापसी तो कभी निर्धारित बच्चे पैदा करने का फरमान! सरकार के लिए यही मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण नज़र आते रहे।

मेक इन इंडिया का नारा मिला पर गिनाने के लिए एक भी बड़ा प्रोजेक्ट नहीँ। संचार मंत्री कॉल ड्राप मंत्री कहलाने लगे। डिजिटल इंडिया का यह आलम है कि भारतीय उपमहाद्वीप तक में भी इंटरनेट के दाम और गति दोनों में भारत सबसे फिस्सडी रहा। विदेश नीति का यह आलम रहा कि ना पाकिस्तान काबू में है और ना चीन। नेपाल के साथ क्या रिश्ते बन गये है ये किसी से छिपा नहीं है| प्रधानमंत्री INS विक्रमादित्य या मंगलयान के UPA सरकार के परियोजनाओं का उद्घाटन करते रहे पर दूसरी ही साँस में गाते रहे कि साठ साल में भारत ने कुछ हासिल नहीँ किया!!

प्रधानमंत्री मोदी के सरकार के 2 साल के कार्यकाल में कामयाबी के नाम पर कुछ है तो बस चतुराई से किए गए आधार, GST और FDI जैसे U Turn, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे नई बोतल में पुरानी शराब, आदर्श ग्राम योजना, जन धन या स्वच्छ भारत अभियान जैसी फेल योजनाओं पर झूठे प्रचार की लीपापोती, UPA के परियोजनाओं के उद्घाटनों में अपना झूठा महिमामण्डन और प्रायोजित कार्यक्रमों में पैसों और प्रोपेगेंडा के दम पर- मोदी मोदी- का झूठा मन्त्रोच्चार!!

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