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मोदी सरकार की अनदेखी और ख़तरे में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का किशनगंज सेन्टर

बिहार के किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) का सेन्टर राजनीति के मकड़जाल में उलझ कर रह गया है. इस केंद्र के लिए जो जगह दी गई है, वह महानंदा नदी से सटी हुई है. हालत ये है कि महानंदा के कटाव-क्षेत्र में ही इस केंद्र का एक बड़ा हिस्सा उपयोगिता के लिहाज़ से बेकार हो चला है. और जो पैसे इस केंद्र के नाम पर आवंटित किए गए थे, उनसे किसी भी ठोस कार्य की शुरूआत नहीं की जा सकी है.

इस केंद्र के वर्तमान कार्यवाहक निदेशक डॉ. राशिद नेहाल का कहना है, ‘पूर्व में केन्द्र की यूपीए सरकार ने 136 करोड़ का बजट इस सेन्टर के लिए तय किया था. लेकिन केन्द्र सरकार से अभी तक सिर्फ़ 10 करोड़ रूपये ही हासिल हुए, जो इस ज़मीन के इर्द-गिर्द बाउंड्री वाल व अन्य कार्यों में खर्च हो चुके हैं. हम केन्द्र सरकार से बाक़ी के फंड के मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.’

हमने उस जगह को भी जाकर देखा, जहां एएमयू का यह प्रस्तावित सेन्टर बनना है. हैरानी की बात यह है कि इस 224 एकड़ ज़मीन के चारों ओर बनायी गयी बाउंड्री वाल का काफी हिस्सा गिरकर गायब हो चुका है. सरकार की ओर से इसे दोबारा बनाने की कोई भी गंभीर कोशिश नहीं की जा रही है. यही नहीं, तक़रीबन 100 एकड़ ज़मीन अब तक महानंदा नदी में समा चुकी है. स्थानीय लोगों की मानें तो यह सेन्टर अब केन्द्र सरकार का सिर्फ़ एक कोरा आश्वासन बनकर रह गया है. सरकार की इच्छा-शक्ति कहीं से भी इसे अमली जामा पहनाने की नज़र नहीं आती है.

यहां यह भी स्पष्ट रहे कि भारत सरकार के एजुकेशनल कंसलटेंट इंडिया लिमिटेड ने केन्द्र सरकार को इस बात से ख़बरदार किया है कि इस ज़मीन पर कोई भी बिल्डिंग बनाना फ़िज़ूल है.

इस केंद्र के पूर्व कार्यवाहक निदेशक मो. सज्जाद का कहना है, ‘बिहार के किशनगंज के इस क्षेत्र में कई तरह का पिछड़ापन है. और इस तरह के पिछड़ेपन के लिए ज़रूरी है कि वहां एएमयू जैसी शिक्षण संस्थाओं को बनाया जाए. जब यहां शिक्षा का प्रसार होगा, तभी तो यहां ‘सबका साथ –सबका विकास’ होगा. आगे मो. सज्जाद बताते हैं, ‘अब तक इस सेन्टर के न खुल पाने की असल वजह फंड है. केन्द्र सरकार ने अब तक फंड रिलीज़ नहीं किया, यही सबसे बड़ी रूकावट है. ऐसे में केन्द्र सरकार से अपील है कि वो जल्द से जल्द फंड रिलीज़ करे ताकि ये केंद्र इस इलाक़े के पिछड़ेपन को दूर कर सके. और वैसे भी फंड रोकने का कोई आधार सरकार के पास नहीं है.’

बताते चलें कि एएमयू का किशनगंज सेन्टर फिलहाल खानापूरी के तौर पर चल रहा है. बिल्डिंग न होने की सूरत में बिहार सरकार ने अल्पसंख्यक छात्रों के लिए जो हॉस्टल बनाया था, उसी हॉस्टल के विद्यार्थियों को निकालकर यहां सेन्टर चलाया जा रहा है. यानी इस सेन्टर की न स्थायी बिल्डिंग है और न ही बनने की संभावना दूर-दूर तक नज़र आ रही है. पूरा का पूरा प्रोजेक्ट को ही एक अस्थायी समझौते के तहत लागू करने की कोशिश के अधीन देखा जा रहा है, जिसे कभी भी किसी न किसी बहाने बंद भी किया जा सकता है.

यहां यह बात भी ग़ौर करने वाली है कि इसी केंद्र से महज़ 15 किलोमीटर की दूरी पर बिहार सरकार का एपीजे अबुल कलाम कृषि महाविद्यालय बनकर खड़ा हो गया है. यहां सारे कोर्स भी शुरू किए जा चुके हैं. जबकि यह महाविद्यालय एएमयू सेन्टर के प्रक्रिया में आने के बाद में बनना शुरू हुआ था.

हालांकि बड़ी मशक़्क़त के बाद 2013 में एएमयू के केरल कैंपस से मदद लेकर किशनगंज के अल्पसंख्यक हॉस्टल में एएमयू किशनगंज सेन्टर क़ायम करके बीएड और एमबीए जैसे दो कोर्सों की शुरूआत कर दी गई. दोनों कोर्सों में 60-60 सीटें रखी गई हैं. लेकिन एमबीए के लिए इस बार सिर्फ़ 23 छात्रों ने ही दाख़िला लिया है. यही हाल बीएड का भी है. बल्कि बीएड की कहानी तो यह है कि अभी तक इस कोर्स को सरकार की ओर मान्यता प्राप्त नहीं हुई है.

एक बड़ी सच्चाई यह है कि सरकार की ओर से एक भी पद इस सेन्टर के लिए स्वीकृत नहीं किया गया है. बावजूद इसके, यहां फिलहाल 30 लोग काम कर रहे हैं. एक सच्चाई यह भी है कि इस सेन्टर के पास बिल्डिंग का मास्टर प्लान भी नहीं है. स्थानीय लोगों की शिकायत इस सेन्टर को चलाने वाले लोगों से भी है. इनका कहना है कि जान-बूझकर दाख़िले के लिए टेस्ट सेन्टर किशनगंज के बजाए पटना रख दिया गया, जिससे हमारी लड़कियां इस कोर्स से महरूम रह गई. स्थानीय लोगों की मानें तो किशनगंज स्थित इस सेन्टर में किशनगंज के ही छात्र-छात्राएं नाम मात्र भर ही हैं.

इन लोगों का यह भी कहना है कि सबसे पहले यहां महिला कॉलेज और लड़कियों के लिए पॉलिटेक्निक खोलने की ज़रूरत थी, लेकिन एएमयू प्रशासन ने ऐसा नहीं किया. इन लोगों का मानना है कि शिक्षा की ज़रूरत लड़कियों को अधिक है, लड़के तो बाहर जाकर भी पढ़ लेते हैं.

इस सेन्टर के लिए किशनगंज में सालों चली मुहिम में शामिल रहने वाले गुलाम शाहिद का कहना है कि केन्द्र सरकार इस सेन्टर के साथ सौतेला बर्ताव बरत रही है. इसके लिए तहरीक चलाने वाले सारे लोग अब मायूस हो चुके हैं. वे कहते हैं, ‘लेकिन हमारी कोशिश है कि फिर दोगुनी ताक़त के साथ इसके लिए तहरीक चलाई जाए.’ गुलाम शाहिद किशनगंज एजुकेशन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं.

किशनगंज एजुकेशन मूवमेंट से जुड़े डॉ. ज़रीफ़ अहमद का कहना है, ‘यूपीए सरकार की भी नीयत इस केंद्र को लेकर साफ़ नहीं थी. सोनिया गांधी ने भी सिर्फ़ फंड का ऐलान ही किया, लेकिन दिया कुछ भी नहीं. वहीं वसीकुर रहमान का कहना है कि महानंदा नदी के किनारे 224 एकड़ बेकार ज़मीन देकर नीतिश सरकार भी इस मसले पर हमेशा ख़ामोश ही रही. वे कहते हैं, ‘यहां के सांसद भी ख़ामोश हैं. उनके भी कान पर जूं तक रेंगती, जबकि ये वही शख्स हैं जिन्होंने कहा था कि अगर सेन्टर नहीं बना तो इस्तीफ़ा दे दूंगा. इस्तीफ़ा देने की बात तो दूर संसद में दो लफ़्ज़ भी नहीं बोल पाए हैं. ऐसा ही वादा यहां के विधायकों ने भी किया था, लेकिन अब उन्हें इससे कोई मतलब नहीं.’

इस मसले पर बीते दो बार से चुने जा रहे यहां के सांसद मोहम्मद असरारुल हक़ TwoCircles.net के साथ बातचीत में बताते हैं, ‘30 जनवरी, 2014 को यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने इस सेन्टर का शिलान्यास करते हुए 136 करोड़ का फंड देने का ऐलान किया. वित्त मंत्रालय से वो पास भी हो गया. लेकिन लोकसभा चुनाव के कारण वो फंड उस वक़्त जारी नहीं किया जा सका. बाद में सरकार बदल गई. तब मैंने इस मसले को लेकर राष्ट्रपति से मुलाक़ात की. तब केन्द्र की मोदी सरकार ने महज़ 10 करोड़ का फंड जारी किया जो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है.’

उन्होंने आगे बताया कि बाक़ी का फंड जारी करने की प्रक्रिया चल रही है, अगर तुरंत फंड नहीं दिया गया तो आगे आने वाले सत्र में वे इस मसले को संसद में रखेंगे और फिर से एक अभियान की शुरूआत करेंगे.

वहीं ह्यूमन चेन नामक संस्था के अध्यक्ष मो. असलम का कहना है, ‘2016 के अप्रैल महीने में मेरी अध्यक्षता में हमारा एक प्रतिनिधि मंडल एएमयू के वाईस चांसलर ज़मीरूद्दीन शाह के साथ पीएम मोदी से मिलने गया था. हमने पीएम मोदी के सामने फंड से जुड़ी तमाम बातों को रखा. इस मुलाक़ात में पीएम मोदी ने कहा कि आगे देखते हैं. और इस मुलाक़ात के बाद उन्होंने 10 करोड़ का फंड जारी कर दिया.’

सच तो यह है कि इस सेन्टर के स्थापित होने की उम्मीद जताए यहां के स्थानीय लोग केन्द्र सरकार से लगातार गुहार कर रहे हैं. जन-प्रतिनिधियों से मिलकर हस्तक्षेप की विनती भी कर रहे हैं, मगर किसी को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है. मोदी सरकार के प्राथमिकता में शायद ये सेन्टर है ही नहीं. शायद केंद्र सरकार ने यह तय कर लिया है कि इसे ऐलान तक ही समेट देना है. कुल मिलाकर एएमयू का यह सेन्टर सियासत और आश्वासनों के ऐलान की आग में झुलसने की मुहाने पर आ चुका है.

यहां यह भी बताते चलें कि एएमयू की स्वायत्तता में सरकार के कथित हस्तक्षेप को लेकर विपक्षी पार्टियां राज्यसभा में हंगामा भी कर चुकी हैं. जिसके कारण राज्यसभा की बैठक को स्थगित भी करना पड़ा था. सपा के जावेद अली ख़ान ने राज्यसभा में अपनी बात रखते हुए बताया था कि एएमयू के ज़रिए अपने परिसर से बाहर खोले जाने वाले पांच सेंटरों में तीन सेंटर खुल चुके हैं और दो खोले जाने हैं लेकिन विश्वविद्यालय के कुलपति का एक बयान आया है कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री ने इन सेन्टरों को गैरक़ानूनी क़रार देते हुए इन्हें दी जाने वाली वित्तीय सहायता बंद करने की धमकी दी है.

यहां उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस यूनिवर्सिटी के विजिटर फेलो स्वयं राष्ट्रपति हैं और उनकी मंजूरी के बिना यूनिवर्सिटी की अकादमिक परिषद और एग्जीक्यूटिव समिति कोई निर्णय नहीं कर सकती. इन दोनों ने मिलकर एएमयू क़ानून की धारा-12 के तहत साल 2008 में परिसर से बाहर पांच सेंटर स्थापित करने का निर्णय किया था. फिर मानव संसाधन विकास मंत्रालय एएमयू के सेंटरों को दिया जाने वाला अनुदान रोकने की बात कैसे कह सकता है?

यह भी स्पष्ट रहे कि सच्चर समिति की रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन और उनकी हालत के बारे में बताए जाने के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस संबंध में एक नीति बनाई और विश्वविद्यालय ने संस्थान के परिसर के बाहर पांच केंद्र खोलने का निर्णय किया था. तीन केंद्र जैसे-तैसे केरल के मलप्पुरम, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और बिहार के किशनगंज में खोले जा चुके हैं तथा शेष दो सेन्टर खोले जाने हैं. लेकिन अब भाजपा सरकार इस फैसले पर सवाल उठा रही है और खुल चुके तीनों केंद्र को कोई फंड नहीं दिया जा रहा है.

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