Monday , July 23 2018

मोदी सरकार में महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा कहां गायब हो गया?

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान छेड़ने वाली भारत सरकार यह नहीं बता रही है कि बीते ढाई साल में उसने बेटियों की सुरक्षा के लिए क्या क्या किया? अब भी हर रोज महिलाओं के खिलाफ बर्बर यौन अपराध हो रहे हैं.

दिल्ली में हुए निर्भया रेप कांड के बाद भारत में महिलाओं की सुरक्षा बड़ा मुद्दा बनी. नरेंद्र मोदी ने इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया. तत्कालीन सरकार पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि देश को “एक्ट नहीं एक्शन” चाहिए.

गुड गवर्नेंस का नारा दिया. इसके बाद जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद सौंपा. फिर एक के बाद एक 19 राज्यों में बीजेपी को सत्ता की चाबी थमा दी.

लेकिन अब महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा कहां है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान तो चला दिया लेकिन बेटियों को सुरक्षा कौन देगा. 2015 में देश भर में बलात्कार के 34,000 से ज्यादा मामले सामने आए. 2016 में यह संख्या बढ़कर 34,600 के पार चली गई. 2017 में भी देश के तमाम कोनों से आए दिन सामूहिक बलात्कार की खबरें आईं.

और तो और महिलाओं को जिंदा जलाने के मामले भी सामने आए. लेकिन एक्ट नहीं, एक्शन चाहिए कहने वाले मोदी अब इस मुद्दे पर क्या कर रहे हैं? न तो गृह मंत्री कुछ बोलते हैं, न ही कानून मंत्री.

ऐसा लगता है जैसे महिलाओं की सुरक्षा को केंद्र सरकार सिर्फ राज्यों के अपराध के तौर पर देख रही है. ये अपराध नहीं, समाज की बिगड़ती मनोदशा की निशानियां हैं.

नाबालिग तक सामूहिक बलात्कार के आरोपी बन रहे हैं. स्कूली बच्चे मर्डर और दूसरे किस्म के अपराधों में शामिल हो रहे हैं. यूट्यूब से लेकर तमाम वेबसाइटों पर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में अश्लील सामग्री भरी हुई है. दर्जनों न्यूज साइट्स सेक्स सामग्री से भरी पड़ी है.

स्मार्टफोन के जरिये बच्चों का ऐसी सामग्री के संपर्क में आना बहुत मुमकिन है. सरकारी एजेंसियां इन सब चीजों पर नजर रखने के बजाए सरकार की आलोचना दबाने में लगी हैं. 2014 के बाद एक बार फिर पुलिस सुधार जैसा शब्द नहीं सुनाई पड़ा. ढाई साल गुजर चुके हैं और नतीजे सबके सामने हैं.

ऐप बना देना या मोबाइल पर एक नंबर शुरू कर देना काफी नहीं है. ये अपराध की सूचना देने में सफल हो सकते हैं, अपराध टालने में नहीं. बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों पर काबू पाने के लिए उनसे मनोवैज्ञानिक स्तर पर निबटने की जरूरत है. और इसके लिए पहल प्रधान सेवक को करनी चाहिए.

सौजन्य- DW हिन्दी

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