Tuesday , December 19 2017

मोबाइल फ़ोन की तबाह कारीयां

(मौलाना रहमत उल्लाह हुसैन क़ासिमी) मोबाइल की ईजाद ने फ़ासलों को यकसर ख़त्म कर दिया है। आज दुनिया के एक किनारे पर खड़ा शख़्स दुनिया के दूसरे किनारे पर मौजूद शख़्स से चंद लम्हों में राबिता क़ायम कर सकता है, जिससे बाहमी गुफ़्त-ओ-शनीद और

(मौलाना रहमत उल्लाह हुसैन क़ासिमी) मोबाइल की ईजाद ने फ़ासलों को यकसर ख़त्म कर दिया है। आज दुनिया के एक किनारे पर खड़ा शख़्स दुनिया के दूसरे किनारे पर मौजूद शख़्स से चंद लम्हों में राबिता क़ायम कर सकता है, जिससे बाहमी गुफ़्त-ओ-शनीद और तिजारती ताल्लुक़ात के फ़रोग़ में बड़ी मदद मिली है।

अब एक परदेस में ज़िंदगी गुज़ारने वाले शख़्स को अपने ख़त के जवाब का इंतेज़ार हफ़्तों और महीनों नहीं करना पड़ता, बल्कि दुनिया गोया उसकी मुट्ठी में आ चुकी है, वो जब चाहे और जिस से चाहे बराह-ए-रास्त गुफ़्तगु कर सकता है।

ज़ाहिर है मोबाइल फ़ोन की ये बड़ी ख़ूबी है और उसकी इफ़ादीयत का मर्कज़ी पहलू है, लेकिन इस ने आलमी मुआशरा को आया सिर्फ़ फ़ायदा ही पहुंचाया है या कुछ नुक़्सान भी? तो ये सवाल ज़रा गौरतलब है। हक़ीक़त ये है कि इस आले की ईजाद से जहां हमें बड़ी सहूलतें पहुंची हैं, वहीं इस के ज़रीया बाअज़ ख़राबियां भी दर पेश आयी हैं। मसलन सब से पहली चीज़ जो नुक़्सानदेह है और वो मोबाइल के ज़रीया हम में पैदा हो गई है, वो फुज़ूलखर्ची है, क्योंकि ज़रूरत की हद तक तो रुपया ख़र्च करके बात करना ठीक है, लेकिन बिलाज़रूरत महिज़ तफ़रीह-ए-तबा के लिए हमारे यहां करोड़ों रुपय ख़र्च हो रहे हैं, जिसके मुवासलाती कंपनीयां मुख़्तलिफ़ किस्म के हरबे इस्तेमाल कर रही हैं और करोड़ों अफ़राद को लूट रही हैं।

दूसरी चीज़ जो सब से ज़्यादा गौरतलब है, वो है इसका याद ए इलाही में रुकावट बनना। मोबाइल फ़ोन ने तरक़्क़ी करके अपने अंदर बाअज़ ऐसी चीज़ें पैदा कर ली हैं, जो इसका सबब हैं। मसलन बहुत से लोग आज सिनेमा देखने नहीं जा सकते और बाअज़ लोग ऐसे भी हैं कि उनके घर में टी वी मौजूद है, लेकिन वो अपनी मसरुफ़ियात या नौकरी की वजह से टी वी से ख़ातिरख़वाह लुत्फ़ नहीं उठा सकते, लिहाज़ा इन सब के लिए मोबाइल फ़ोन पर वो सब कुछ जमा कर दिया गया है, जो टी वी और सिनेमा में रहता है, बल्कि इससे भी चार क़दम आगे।

पस शैतान ये नहीं चाहता कि बंदगान ख़ुदा अपने ख़ालिक़ का ज़िक्र करें और अपने ख़ालिक़ के बारे में किसी वक़्त ग़ौर-ओ-फ़िक्र करें, इसीलिए इसने बाअज़ ऐसी चीज़ों को आपना आलाकार बनाया है, जो अपनी असल के एतबार से तो मुफ़ीद मालूम होती हैं, लेकिन उन के अंदर बाअज़ ऐसी ज़रर रसां चीज़ें पोशीदा हैं, जो मोमिनाना किरदार-ओ-अमल और पाकीज़ा अख़लाक़-ओ-जज़बात के लिए निहायत ख़तरनाक हैं।

चुनांचे ऐसी ही चीज़ों में से एक नुमायां चीज़ मोबाइल फ़ोन भी है, जो एक मुफ़ीद आला है, जिसकी इफ़ादीयत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन शैतान के कारिंदों ने इसके अंदर ऐसा ग़लीज़-ओ-नापाक सिस्टम नसब कर दिया है, जिससे इसकी असल हैसियत एक सानवी वजह की चीज़ बन गई है और इसकी अव्वल पोज़ीशन महिज़ एक तफ़रीही आला बन कर रह गई है।

मिसाल के तौर पर इस का मूसीक़ी निज़ाम ही ले लीजिए। जब ये सिस्टम मोबाइल में ना था तो लोग इस का इस्तेमाल इत्तिसालात यानी बाहमी राबिता उस्तिवार करने के लिए करते थे, लेकिन इस सिस्टम की तंसीब के बाद से लोगों की हालत ये हो गई कि वो पूरा पूरा दिन उठते बैठते, चलते फिरते मोबाइल कानों में ठूंसे फिर रहे हैं।

आप छोटे बड़े शहरों और देहातों का इस नज़र से जायज़ा लीजिए तो आप को नज़र आएगा कि लोग किस तरह इयर फ़ोन मोबाइल से कनेक्ट करके कानों में लगाए रहते हैं। हद तो ये है कि बड़े शहरों की बेक़ाबू ट्रैफिक में भी लोग एयर फ़ोन कानों में लगाए हुए म्यूज़िक से लुत्फ़ अंदोज़ होते रहते हैं, हालाँकि उन्हें ट्राफिक में बहुत मुहतात ड्राइविंग करनी चाहीए, लेकिन वो अपने नफ़ा-ओ-नुक़्सान की परवाह किए बगै़र इस में मुनहमिक रहते हैं।

ज़रा ग़ौर कीजिए कि एक मुसलमान का शआर तो ये है कि जब सवारी पर सवार हो तो अल्लाह का ज़िक्र करते हुए सवार हो, यानी सवारी पर बैठते ही दुआ पढ़े। लेकिन ये हज़रात दुआ पढ़ना तो कुजा सवारी पर सवार होने से क़बल ही मोबाइल एयर फ़ोन कानों में ठूँस लेते हैं।

बाअज़ दफ़ा ऐसा भी होता है कि धूम धाम म्यूज़िक की वजह से लोग अपनी सवारी पर क़ाबू खो बैठते हैं और इसके नतीजे में भयानक किस्म के हादिसात पेश आते हैं। चुनांचे ये लोग म्यूज़िक सुनते हुए दुनिया से रुख़सत हो जाते हैं।

ग़ौर फ़रमाईए कि जो लोग अल्लाह के हुज़ूर इस हाल में पहुंचेंगे कि दुनिया के अंदर लहू-ओ-लाब में डूबे हुए थे और जिन्हें अल्लाह की नाफ़रमानी करते हुए मौत ने आलिया होगा, ख़ुदा के नज़दीक उनकी पशेमानी का क्या आलम होगा और अल्लाह तआला उनके साथ किया मुआमला फ़रमाएगा? ये बयान से बाहर है। क्योंकि उस दिन की तकलीफों से जो शख़्स बच जाएगा, वही दरअसल कामयाब होगा और जो इन में फंस गया तो दरअसल वही नाकाम-ओ-नामुराद होगा।

अल्लाह तआला का इरशाद है कि जो फ़रिश्ते अर्श को उठाए हुए हैं और जो फ़रिश्ते इस के इर्दगिर्द हैं, वो अपने रब की तस्बीह-ओ-तहमीद करते रहते हैं और इस पर ईमान रखते हैं और ईमान वालों के लिए इस्तिग़फ़ार किया करते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार! आपकी रहमत और इल्म हर चीज़ को शामिल है, सौ उन लोगों को बख्श दीजिए जिन्होंने तौबा कर ली है और आपके रास्ता पर चलते हैं और उन को जहन्नुम के अज़ाब से बचा लीजिए। ऐ हमारे परवरदिगार! उनको हमेशा रहने की बहिश्तों में जिसका आप ने उन से वाअदा किया है दाख़िल कर दीजीए और उनके माँ बाप और बीवीयों और औलाद में जो लायक़ हों उनको भी दाख़िल कर दीजीए।

बिलाशुबा आप ज़बरदस्त हिक्मत वाले हैं और उनको तकालीफ़ से बचाईए और आप जिसको उस दिन तकलीफ़ से बचा लें तो इस पर आप ने मेहरबानी फ़रमाई और ये बड़ी कामयाबी है। (सूरा अल ग़ाफिर ।७ता९)

आयत मज़कूरा में दो बातें ख़ुसूसी तवज्जा की तालिब हैं, एक तो ये कि अल्लाह तआला के मुक़र्रब तरीन फ़रिश्ते मोमिनो के लिए और उनके माँ बाप और औलाद के लिए इस्तिग़फ़ार में मसरूफ़ रहते हैं और दूसरी बात ये कि आख़िरत में जिस आदमी की पकड़ होगी वो ख़ाइब-ओ-ख़ासिर होगा और जिस पर उस दिन ख़ुदा ने रहम फ़रमा दिया तो वही दरअसल कामयाब शख़्स होगा।

इन दोनों बातों को ज़हन में रखते हुए हमें अपने हाल पर ग़ौर करना चाहीए, यानी ख़ुदा के फ़रिश्ते हमारे लिए इस्तिग़फ़ार में मसरूफ़ हैं और हम इस्तिग़फ़ार और ख़ुदा को याद करने की बजाय हमाऔक़ात म्यूज़िक और बेहूदा फ़िल्मी नग़मों में मशग़ूल हैं।

ज़ाहिर है कि ये सारी ख़राबियां इन्ही जदीद आलात के ज़रीया फ़रोग़ पा रही हैं और इस्लामी मुआशरा आए दिन तनज़्ज़ुली का शिकार होता जा रहा है।

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