मोहन भागवत ने की कांग्रेस की तारीफ़, कहा- देश की आजादी में बड़ा योगदान

मोहन भागवत ने की कांग्रेस की तारीफ़, कहा- देश की आजादी में बड़ा योगदान
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नई दिल्ली: सोमवार यानी आज से नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने तीन दिवसीय लेक्चर सीरीज ‘भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का दृष्टिकोण’ के आयोजन का आगाज किया है।

सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस दौरान उपस्थित लोगों को संबोधित किया। उनके मुताबिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझने के लिए हेडगेवार को समझना जरूरी है। भागवत ने दावा किया कि हेडगेवार ने राजस्थान से आंध्रप्रदेश तक क्रांतिकारी समाज सुधारकों को एकत्रित किया।

इस दौरान भागवत राजनीतिक तौर पर आक्रामक नहीं दिखे। उन्होंने माना कि कांग्रेस की विचारधारा का बड़ा योगदान देश की स्वतंत्रता में रहा। बीजेपी की धुर विरोधी कांग्रेस की सराहना सियासत में उबाल ला सकती है। वो भी ऐसे समय जब कई राज्यों में विधानसभा और लोकसभा का चुनाव नजदीक है।

मोहन भागवत ने खुलासा किया कि आरएसएस गठन के दो साल पहले ही संस्थापक हेडगेवार ने स्वयं सेवक मंडल तैयार कर लिया था। सरसंघचालक के मुताबिक आरएसएस का मकसद एक व्यक्ति का सकारात्मक निर्माण करना है। जिसके बाद देश के लिए उसका अहम योगदान खुद ब खुद देश की उन्नती का प्रतीक बन जाता है।

मोहन भागवत ने कहा कि संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने के मकसद से ही आरएसएस का गठन हुआ था। इसके साथ ही भागवत ने देश की सबसे बड़ी समस्या हिंदुओं को ही बताया। उनके मुताबिक हिंदुओं के पतन के साथ ही देश का पतन आरंभ हुआ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) स्थापना के साथ ही ये सोच रखता रहा है कि राजनीतिक उपलब्धि हासिल करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है।

हालांकि जानकारों की मानें तो आरएसएस भले सियासत की बात न करता हो, लेकिन राजनीति से संघ अछूता नहीं है। आरएसएस भले इस बात से इनकार करता हो कि बीजेपी उसका राजनीतिक धड़ा है। जबकि बीजेपी के प्रभुत्व का आरएसएस खूब इस्तेमाल करता रहा है।

ये जगजाहिर है कि बीजेपी की सरकार जहां जहां है, वहां आरएसएस ने अपनी जड़े जमानी शुरू की। साथ ही आरएसएस से निकले दिग्गज नेताओं ने बीजेपी में रहकर आरएसएस के प्रति घनिष्ठता जारी रखी।

यही नहीं, चुनावों के दौरान आरएसएस के बयानों का असर बीजेपी के वोटों पर पड़ता रहा। लाख संघ कह ले कि उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है। ये आम जनता के गले उतरती नहीं जान पड़ती है।

मजेदार तथ्य ये है कि 93 साल पहले आरएसएस का गठन हुआ था। जबकि बीजेपी का अस्तित्व 1980 से है। बीजेपी के तमाम शुरुआती नेताओं का आरएसएस से नाता रहा है। ये अलग बात है कि बड़े भाई होने के नाते आरएसएस बार बार बीजेपी की राजनीति से पल्ला झाड़ता रहा है। जबकि ऐसा पूर्ण रूप से करना उसके लिए भी असंभव है।

राजनीति के ठीक बाद आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसके बाद काफी जद्दोजहद के बाद 1 अगस्त 1949 को संघ पर से प्रतिबंध हटाया गया। तब आरएसएस ने अपना संविधान बनाकर राजनीति में नहीं जाने का विधान बनाया था। जबकि अब वक्त बदल गया है, संघ की नई पौध बखूबी जानती है कि आरएसएस के रास्ते बीजेपी में पैर जमाना बेहतर विकल्प हो सकता है।

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