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मौलाना आज़ाद ने सयासी मसाइल के लिए मज़हब पर मुफ़ाहमत(समझौता) नहीं की

हैदराबाद ।२0 नवंबर : ( सियासत न्यूज़ ) : मौलाना आज़ाद को सयासी तौर पर कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं हुई चूँकि उन के जो इरादे रहे वो तक़रीबन ही नाकाम हुए । मौलाना अब्बू उल-कलाम आज़ाद हिंदूस्तान में क़ियाम ख़िलाफ़त के ख़ाहिशमंद थे और उन्ह

हैदराबाद ।२0 नवंबर : ( सियासत न्यूज़ ) : मौलाना आज़ाद को सयासी तौर पर कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं हुई चूँकि उन के जो इरादे रहे वो तक़रीबन ही नाकाम हुए । मौलाना अब्बू उल-कलाम आज़ाद हिंदूस्तान में क़ियाम ख़िलाफ़त के ख़ाहिशमंद थे और उन्हों ने ख़िलाफ़त तहरीक भी चलाई लेकिन नाकाम रही इलावा अज़ीं वो तकसीम-ए-हिंद के सख़्त गीर मुख़ालिफ़ रहे लेकिन इस अन्दोहनाक वाक़िया को भी नहीं रोका जा सका । प्रोफ़ैसर अनवर मुअज़्ज़म ने आज मौलाना अब्बू उल-कलाम आज़ाद : एक हमा जिहत फ़िक्र के उनवान से मौलाना आज़ाद नैशनल यूनीवर्सिटी में मुनाक़िदा सहि रोज़ा समीनार की इफ़्तिताही तक़रीब में कलीदी ख़ुतबा के दौरान इन ख़्यालात का इज़हार किया ।

उन्हों ने बताया कि मौलाना आज़ाद एक रासिख़ उल-अक़ीदा मुस्लमान थे और उन्हों ने कभी सयासी मसाइल की बिना पर मज़हब से कोई मुफ़ाहमत (समझौता)नहीं की । प्रोफ़ैसर अनवर मुअज़्ज़म ने बताया कि मौलाना आज़ाद ने अपनी ज़िंदगी में कभी वहदत अदयान की इस्तिलाह इस्तिमाल नहीं की । उन्हों ने हमेशा ही अपने मौक़िफ़ को सख़्त गीर अंदाज़ में दुनिया के सामने पेश किया । प्रोफ़ैसर अनवर मुअज़्ज़म ने बताया कि आज़ाद के बारे में ये राय काफ़ी मक़बूल रही कि वो इब्तिदा-ए-में एक क़दामत पसंद आलम दीन थे लेकिन कांग्रेसी रहनुमा बनने के बाद उन्हों ने कांग्रेस की पालिसीयों के मुताबिक़ मज़हबी ज़ावीया नितर तबदील करलिया लेकिन ये ख़्याल बिलकुल ग़ैर दरुस्त(सही) है ।

उन्हों ने बताया कि मौलाना आज़ाद वाज़िह तौर पर मुस्लमानों को पालिसी साज़ बनने और अपनी पालिसी तैय्यार करने का मश्वरा दिया था और कहा था कि मग़रिब या हिन्दुओ से तहज़ीब-ओ-मुआशरत और सियास्यात के सबक़ सीखने की ज़रूरत नहीं है बल्कि हमें क़ुरआन मजीद की इत्तिबा करनी चाहिए ।

मौलाना आज़ाद का ये कहना रहा कि असल तबदीली मज़हबी तबदीली है । इस के बगै़र सयासी पालिसी में तबदीली से कुछ नहीं होगा । प्रोफ़ैसर अनवर मुअज़्ज़म ने कलीदी ख़ुतबा के दौरान मौलाना अब्बू उल-कलाम आज़ाद की ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ उमूर बिलख़सूस इलम , अक़ीदा और तफ़क्कुरात पर सैर हासिल गुफ़्तगु(बातचीत‌) की । उन्हों ने बताया कि मौलाना आज़ाद का ज़वाया नज़र इस आलम और दानिश्वर का ज़ावीया नज़र है जो अपने मुआशरे को इस्लामी हिदायत की रोशनी में बेहतर सूरत-ए-हाल में बदलना चाहता है । उन्हों ने वाज़िह किया कि आज हमें आज़ाद की मज़हबी अलामात और इस्तिलाहात से वाबस्तगी ग़ैर सैकूलर नज़र आती है लेकिन ख़ुद गांधी जी ने भी मज़हबी अलामात और इस्तलाहों के ज़रीया ही हिंदू अवाम में सयासी-ओ-समाजी बेदारी पैदा की थी ।

इस मौक़ा पर प्रोफ़ैसर सुलेमान सिद्दीक़ी आर्गेनाईज़र समीनार , जनाब आबिद अबदुलवासे के इलावा दीगर मौजूद थे । प्रोफ़ैसर बी शेख़ अली साबिक़ वाइस चांसलर गोवा-ओ-मंगलोर यूनीवर्सिटी ने इस समीनार की सदारत की । प्रोफ़ैसर बी शेख़ अली ने इस मौक़ा पर अपने ख़िताब के दौरान मौलाना आज़ाद को एक अज़ीम इंसान क़रार देते हुए कहा कि इस दौर की कई अहम शख्सियतें मौलाना आज़ाद की शख़्सियत से मरऊब थीं ।

मौलाना आज़ाद ने मज़हबी मुआमलात में कभी मुफ़ाहमत नहीं की और वो इलम-ओ-तदब्बुर के मुआमला में बेहद ज़हीन थे । प्रोफ़ैसर शेख़ अली ने बताया कि हिंदूस्तान में हज़रत शाह वली अल्लाह के बाद ज़हानत का नाम मौलाना अब्बू उल-कलाम आज़ाद है । इस समीनार में मौलाना अबदुर्रहीम क़ुरैशी , जनाब ज़िया उद्दीन नय्यर , जनाब सज्जाद शाहिद , प्रोफ़ैसर रिहाना सुलताना , के इलावा दीगर कई अहम शख्सियतें मौजूद थीं ।

बादअज़ां मौलाना आज़ाद नैशनल यूनीवर्सिटी के मर्कज़ी कुतुब ख़ाना के अक़ब में वाक़्य कुशादा हाल में मौलाना आज़ाद पर मबनी ख़ुसूसी तस्वीरी नुमाइश का इफ़्तिताह अमल में आया । इस नुमाइश में मौलाना आज़ाद के अख़बार अलहलाल और अलबलाग़ की जिल्दें भी नुमाइश की ग़रज़ से रखी गई हैं और इस नुमाइश में चंद मकतूब भी मौजूद हैं जो आज़ाद के तहरीर करदा हैं ।

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