Tuesday , December 12 2017

म्यांमार में मुसलमानों के खिलाफ लगातार बढ़ता जुल्म

म्यांमार में मुसलमान सदियों से रह रहे हैं लेकिन बौद्ध बहुल इस देश में मुस्लिमों को लेकर भेदभाव, प्रताड़ना और हिंसा की वारदात में लगतार बढ़ोतरी हो रही है। वर्ल्ड मीडिया में कई ऐसी रिपोर्ट आ रही है जिसमें बताया जा रहा है कि मुसलमानों के साथ रेप, प्रताड़ना, जबरन हिरासत में लेना और हिंसा सामान्य सी बात हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुस्लिमों के खिलाफ होने वाली वारदातों को लेकर प्रशासन उपेक्षा का रवैया अपनाता है।

थाउन्ग्टन गांव के प्रवेश द्वार पर एक पीले रंग का साइनबोर्ड लटकाया गया है। इसमें लिखा हुआ है, यहां पूरी रात मुस्लिमों को रुकने की अनुमति नहीं है। यहां किसी भी मुस्लिम को किराए पर घर नहीं मिलेगा। मुस्लिमों के साथ शादी नहीं होगी। इस गांव को बौद्धों ने यह साइनबोर्ड मार्च महीने में लगाया था। म्यांमार के इरावडी डेल्टा इलाके में गांव वाले एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर कैंपेन चला रहे हैं कि वे बिना मुस्लिमों को रहना चाहते हैं।

इसी तरह के बोर्ड म्यांमार के कई गावों में लगाए जा चुके हैं। म्यांमार में ‘केवल बौद्ध’ वाली प्रवृत्ति तेजी से फैल रही है। इस वजह से मुसलमनों के प्रति नफरत की भावना में भी बढ़ोतरी हो रही है। म्यांमार के नवजात लोकतंत्र के लिए यह प्रवृत्ति एक बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहा है।

अब म्यांमार की कमान लोकतंत्रवादी नेता आंग सान सू की के हाथों में है लेकिन अब भी अहम विभागों पर सेना का ही कब्जा है। दशकों से मिलिटरी शासन से शासित रहे म्यांमार में नए युग की शुरुआत हुई है। म्यांमार फिलहाल अंधराष्ट्रवादी गतिविधियों की चपेट में है।

पिछले महीने सैकड़ों लोग यांगून में अमेरिकी दूतावास के सामने जुटे थे। ये अमेरिकी डिप्लोमैट्स से मांग कर रहे थे कि रोहिंग्या शब्द का इस्तेमाल बंद किया जाए। इस शब्द के जरिए लाखों मुस्लिमों को आंतरिक विस्थापन के कारण पश्चिमी म्यांमार के गांवों में बनाए गए राहत शिविरों में रखा गया है। इनका कहना है कि ये लोग बांग्लादेशी अवैध प्रवासी हैं।

कहा जा रहा है कि सू की ने अमेरिकी राजदूत को रोहिंग्या शब्द इस्तेमाल नहीं करने को कहा है। धर्म के लिए नए मंत्री ऑन्ग ने कहा कि था मुस्लिम और हिन्दू संबद्ध नागरिक हैं। म्यांमार में नई सरकार बनने के बाद भी वहां के अल्पसंख्यकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यहां के अल्पसंख्यक अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं।

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