Wednesday , December 13 2017

यमन युद्ध: ‘मेरे बच्चे भूख से दम तोड़ रहे हैं’

यमन: यमन के अल-तोहैता इलाक़े की एक सुनसान बस्ती में 14 भाई बहन वाला परिवार अक्सर भूखा सोता है। छह साल के अहमद पर रोज़-रोज़ भूखा सोने का असर सबसे ज़्यादा दिख रहा है। उनका वज़न बेहद कम है और शरीर की पसलियां बाहर हैं. अब्दुल्लाह के पिता अली अल जज़ीरा से कहते हैं, ‘ मेरे कुल 14 बच्चे हैं और मुझे हर दिन महज़ 500 यमनी रियाल यानी कि दो अमेरिकी डॉलर मिलते हैं। मैं बहुत मुश्किल से अपने बच्चों के लिए रोटी, चाय और बकरी का दूध जुटा पाता हूँ। वे कुपोषण से पीड़ित हैं और उन्हें खाना चाहिए’।

अल-तोहैता के अधिकतर बाशिंदों की आमदनी पशुपालन से होती है लेकिन एक ठीक-ठाक ज़िंदगी के लिए इससे होने वाली आमदनी कम पड़ जाती है। यहां ज़्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं है और परिवार काफ़ी बड़ा है। कई संगठन इनके लिए खाने और बिस्तर का इंतज़ाम करते थे लेकिन लगातार युद्ध की मार में यह सुविधाएं कम पड़ रही हैं.

अली ने अल जज़ीरा से कहा, ‘दो साल से हमें किसी तरह की मदद नहीं मिली है। मुझे अपने बच्चों के लिए खाने के अलावा और कुछ नहीं चाहिए। मेरे बच्चे भूख से मर रहे हैं।

वर्ल्ड फुड प्रोग्राम के मुताबिक लगभग 14 मिलियन यानी कि यमन की आधी से ज़्यादा आबादी को ज़रूरतभर का खाना नहीं मिल पा रहा है। भूख की वजह से हजारों की मौत हो चुकी है और 15 लाख से अधिक युद्ध के नाते विस्थापित हैं।

अल जज़ीरा के मुताबिक तोहैता की झुग्गियों में घूमने पर पता चलता है कि ज़्यादातर घरों में सब्जियां, फल और दूध खरीदने के लिए रुपया नहीं है.

यमन में संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, यूनिसेफ के प्रवक्ता मोहम्मद अल-असादी ने बताया कि अगस्त तक कम से कम 370,000 बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण से पीड़ित थे। ‘पिछले साल की तुलना में इस साल संख्या में 50 फ़ीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है. असादी ने बताया कि यूनिसेफ ने चार मोबाइल टीमों को तैनात किया है, जो पिछले सप्ताह में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों के 150 मामलों से अधिक का पता लगा चुकी हैं’।

असादी बताते हैं कि सुरक्षा कारणों या आपूर्ति या ईंधन की कमी से देशभर में 600 स्वास्थ्य केंद्रों की सेवाएं ठप हैं। पिछले साल हजारों यमनी बच्चों की मौत उन रोगों से हुई जिनका इलाज संभव था।

तोहैता के बाशिंदे साफ़ सफाई और साफ़ पीने के पानी की भीषण किल्लत से जूझ रहे हैं। उन्हें पीने का साफ़ पानी लाने में दो घंटे लगते हैं जिसको वे गधों की मदद से ढोते हैं। यहाँ अस्पताल और स्कूलों जैसी बुनियादी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।

पिछले एक साल में यहाँ कुछ बच्चों को त्वचा रोग हो गया है, उनकी त्वचा पर लाल धब्बे और खुजली होती है। आठ वर्षीय माहा मुहम्मद सालेम पिछले दो महीने से इस बीमारी से पीड़ित है। माहा के बेरोजगार पिता अपने 11 बच्चों को खिलाने के लिए अपनी पांच बकरियों के दूध और पड़ोसियों के दान पर निर्भर हैं।

‘मुझे पता है कि यह बीमारी मेरे भाई बहन को भी लग सकती है, इसलिए मैं दिन के दौरान उनके दूर रहने के लिए कोशिश करती हूँ। लेकिन रात में, हम एक ही झुग्गी में सोते हैं इसलिए यह बीमारी मेरे एक साल के भाई को भी लग गई है। मैंने सुना है कि होदिदह शहर में अस्पताल इस रोग से पीड़ित बच्चों का इलाज कर रहे हैं, लेकिन हमारे पास वहां जाने के लिए पैसा नहीं है’।

माहा के पिता मोहम्मद ने कहा, ‘मेरे लिए अपने बच्चों को शहर ले जाना मुश्किल है, इसलिए इन्हें इस रेगिस्तान में ही अपनी तक़दीद टटोलनी होगी। मेरे पास कोई उपाय नहीं है’।

संयुक्त राष्ट्र के आपातकालीन राहत समन्वयक स्टीफन ओ ब्रायन के मुताबिक होदिदह शहर में स्थिति बेहद गंभीर हो गयी है।
‘भोजन, दवा और ईंधन की आपूर्ति ज़रूरत के मुकाबले बहुत कम है’।

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