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यरुशलम पर ट्रम्प के विवादित फैसले ने क्या तोड़ा यूरोपीय देशों का भरोसा?

यूरोपीय संघ के देश सामूहिक सुरक्षा तंत्र विकसित करने की तरफ एक कदम आगे बढ़े हैं. यूरोपीय काउंसिल ने यूरोपियन डिफेंस एंड सिक्योरिटी कोऑपरेशन नेटवर्क की स्थापना को मान्यता दे दी है. इसे पेस्को भी कहा जा रहा है.

यूरोपीय संघ की लिस्बन संधि में पहली बार पेस्को का जिक्र हुआ था. लेकिन उसके बाद यह ठंडे बस्ते में चला गया. अब बदलते वैश्विक समीकरणों के चलते इसकी जरूरत महसूस हो रही है.

पेस्को के तहत यूरोपीय संघ के सदस्य देश मिलकर नई सैन्य क्षमताएं विकसित कर सकेंगे. मिल जुलकर सेना के लिए नई तकनीक विकसित करेंगे.

यूरोपीय संघ के 23 देशों के रक्षा मंत्रियों ने पेस्को से जुड़े साझा नोटिफिकेशन पर दस्तखत किये हैं. 13 नवंबर को इस पर हस्ताक्षर करने के बाद नोटिफिकेशन को यूरोपीय संघ की विदेशी नीति प्रभारी फेडेरिका मोघेरिनी और यूरोपीय काउंसिल के पास भेजा गया.

सात दिसंबर को पुर्तगाल और आयरलैंड ने भी इसमें शामिल होने का एलान कर दिया. अब 25 देश इसके सदस्य हो चुके हैं. माल्टा और डेनमार्क ने खास दर्जे की वजह से इसमें हिस्सा नहीं लिया, वहीं यूके को ब्रेक्जिट की वजह से बाहर रहना पड़ा. मार्च 2019 से यूके यूरोपीय संघ से अलग होने लगेगा.

फिलहाल अधिकारियों के बीच 17 साझा प्रोजेक्टों पर सहमति बनी हैं. इनके तहत सभी सदस्य देशों की सेनाओं के लिए साझे ट्रेनिंग सेंटर बनेंगे. सदस्य सेनाओं की क्षमता बढ़ाई जाएगी और साझा मिलिट्री रेडियो कम्युनिकेशन भी विकसित किया जाएगा.

2014 के क्रीमिया विवाद के बाद यूरोप और रूस के बीच मतभेद गहरा चुके हैं. लंबे समय तक अमेरिका यूरोप का साझेदार रहा, लेकिन डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से इस दोस्ती में दरारें उभर आई हैं.

जलवायु परिवर्तन, सुरक्षा, रूस और येरुशलम जैसे मुद्दों पर यूरोप और अमेरिका की राय बिल्कुल मेल नहीं खा रही है.

ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि नाटो की मजबूती के लिए यूरोपीय संघ के देशों को भी पर्याप्त पैसा देना होगा, वरना अमेरिका अकेले नाटो को नहीं चला सकता. ट्रंप के इस रुख की वजह से यूरोप और अमेरिका के बीच मतभेद गहरा रहे हैं.

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