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युवाओं ने कहा – “युवाओं की तरक्क़ी में रुकावट है बाबरी मस्जिद-राम मंदिर का मुद्दा“

लखनऊ : आज हमने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मुद्दे पर उस सूबे की दारुल हुकूमत में युवाओं की राय लेने की कोशिश की जहां का ये मुआमला है. शहर की मशहूर लखनऊ यूनिवर्सिटी में जब हमने स्टूडेंट्स से राय ली तो उसमें कई एक स्टूडेंट्स ने इस मुद्दे पर जहां खुल के बात रखी तो कई एक “नो कमेंट” करके अपनी बात रखने से बचे लेकिन कुल मिला के जो हमारे पास राय आई उसमें इस मुद्दे को ग़ैर ज़रूरी मानते हुए यहाँ के स्टूडेंट्स रोज़गार, इकॉनमी और ग़रीबी के मुद्दे पर बहस करना चाहते हैं.

पढ़िए कुछ स्टूडेंट्स की राय…..

मज़हबी टकराव बढाने के लिए और आने वाले इलेक्शन में असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए उठाया जा रहा है ये मुद्दा – ज्योति (एम.ए.- Western History)

ना मंदिर, ना मस्जिद वहाँ कोई कारख़ाना लगाइए – सौरभ सिंह (एम. ए. – Western History)

जज़्बात भड़काने का तरीक़ा है – शैलेन्द्र (एम.ए. Archeology)

फ़ालतू का मुद्दा है – स्वाति कनौजिया (एम.ए. Geography)

युवाओं की तरक्क़ी में रुकावट है ये मुद्दा – मोहम्मद रेहान (M.B.A.-International Business)

मंदिर और मस्जिद दोनों बन जाएँ – अमृता शुक्ला (B.Sc. 1st year)

कोर्ट से बाहर बहस ही नहीं होनी चाहिए – सबा अंसारी (B.A.- 1st Year Urdu)

युवाओं को मज़हब के हिसाब से नहीं बांटना चाहिए, यूनिवर्सिटी में धर्म पर तार्किक बहस हो सकती है उन्मादी बहस नहीं – प्रशांत मिश्र (एम.ए. –Composite History)

हम युवाओं को मज़हब के लिए नहीं लड़ना चाहिए – धीरज कुमार श्रीवास्तव (एम.ए.– Composite History)

इससे ज़्यादा ज़रूरी दूसरे मुद्दे हैं – निकहत जहां (B.A. – 1st Year Urdu)

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