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यूपी में स्कूल न जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी, शौचालय न होना भी कारण

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति और बदहाल होती जा रही है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता और सुविधाएं बढ़ने की जगह घटने के कारण स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है। छात्राओं के मामले में उम्र बढ़ने के साथ उनका ड्रॉप आउट प्रतिशत भी बढ़ता जा रहा है। यह खुलासा प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की सालाना रिपोर्ट में हुआ है।

साल 2016 में प्रदेश के 1966 सरकारी स्कूलों में किए गए सर्वे में सामने आया है कि 60 या इससे कम बच्चों वाले स्कूलों की संख्या वर्ष 2010 में केवल 5.3 प्रतिशत थी, जो 2016 में बढ़कर 13 फीसदी से ज्यादा हो गई है। यहां पढ़ रहे बच्चों की उपस्थिति के आंकड़ों में भी एक फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक लड़कियों के 50 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था ही नहीं है। जहां शौचालय हैं, वो इस्तेमाल लायक नहीं हैं। लड़कियों के ड्रॉप आउट की यह भी एक बड़ी वजह है।

पांचवीं के 80 फीसदी छात्र दूसरी कक्षा के पाठ सही तरीके से पढ़ नहीं पाते। आठवीं के 70 फीसदी छात्र दूसरी कक्षा के पाठ भी नहीं पढ़ पाते। आंकड़ों के मुताबिक इसकी एक बड़ी वजह यह भी मानी गई है कि इन स्कूलों में करीब 50 फीसदी शिक्षक पढ़ाने ही नहीं आते।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 से 2016 के बीच स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। ऐसे राज्यों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश सबसे आगे हैं। उत्तर प्रदेश में इन दो वर्षों के बीच स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 4.9% से बढ़कर 5.3% हो गया। प्रदेश के केवल 37 फीसदी बच्चे ही सरकारी स्कूलों में जाते हैं। यही नहीं सात से 16 वर्ष की आयु के करीब 8 फीसदी बच्चे कभी स्कूल जाते ही नहीं हैं।
घटाना नहीं जानते

रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में पांचवीं और आठवीं के बच्चे जोड़-घटाना और भाग तक नहीं जानते। पांचवीं के करीब 80 फीसदी बच्चे घटाना और भाग नहीं कर सके। 70% को अंकों की पहचान नहीं थी। आठवीं तक के 60% छात्र भाग करने में असफल रहे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पांचवीं के 80 फीसदी बच्चे सरल अंग्रेजी के शब्द भी नहीं जानते और 82 फीसदी को वाक्य की समझ नहीं है। आठवीं तक के 74 फीसदी बच्चे सरल शब्द और करीब 80 फीसदी से ज्यादा विद्यार्थी सरल वाक्य तक नहीं बोल और समझ पाते।

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