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यौम ए आशूरा का रोज़ा रखने से एक साल का गुनाह माफ़

अल्लाह ताआला ने अपने ख़ुसूसी फ़ज़ल से उम्मते मुहम्मदिया (स०अ०व०) के लिए कुछ वक़्त एसे मुतय्यन किए हैं जिनमें नेक आमाल पर आम औक़ात के मुक़ाबले में कई गुना अज्र दिया जाता है , मसलन शब ए क़दर कि ये हज़ार महीनों से बेहतर है , महीनों में रमज़ा

अल्लाह ताआला ने अपने ख़ुसूसी फ़ज़ल से उम्मते मुहम्मदिया (स०अ०व०) के लिए कुछ वक़्त एसे मुतय्यन किए हैं जिनमें नेक आमाल पर आम औक़ात के मुक़ाबले में कई गुना अज्र दिया जाता है , मसलन शब ए क़दर कि ये हज़ार महीनों से बेहतर है , महीनों में रमज़ान उल-मुबारक को बड़ी फ़ज़ीलत बख़शी , दिनों में जुमा के दिन को अफ़ज़ल क़रार दिया गया , तारीखों में ज़ीलहजा की कुछ तारीखें , माह मुहर्रम की नवीं और दसवीं तारीखें वगैरह इन ख़्यालात काइज़हार मौलाना अबुलहसन क़ासिमी ने मदर्रिसा अरबिया हशमत उल-उलूम सुलेमान नगर में एक इजतेमा से ख़िताब करते हुए किया ।

उन्हों ने कहा कि स्लामी एतबार से माह मुहर्रम को बड़ी फ़ज़ीलत बख़शी गई और नफ़ल रोज़ों के लिहाज़ से इस महीना के रोज़ों काबड़ा अज्र बताया गया ।

रसूल (स०अ०व०) ने इरशाद फ़रमाया रमज़ान के बाद सब से अफ़ज़ल रोज़े अल्लाह ताअला का महीना मुहर्रम के रोज़े हैं और फ़र्ज़ नमाज़ के बाद सब से अफ़ज़ल नमाज़ रात की नमाज़ ( तहज्जुद) है , इस में माह मुहर्रम की निसबत अल्लाह की जानिब की गई , जिस से इस बात की तरफ़ साफ़ इशारा मिलता है कि ये महीना इंतिहाई अहम और तक़र्रुब अली अल्लाह का ज़रीया है ।

उन्हों ने ये भी कहा कि यौम ए आशूरा यानी मुहर्रम की दसवीं तारीख को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इसराईल को ज़ालिम फ़िरऔन की ज़ुलम-ओ-ज़्यादती से नजात दी जिस के शुक्र में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम इस दिन रोज़ा रखा और बनी इसराईल ने हज़रत मौस‌ की पैरवी की , जब रसूल (स०अ०व०) तशरीफ़ लाए तो आप ने भी इस सुंत पर अमल किया और उम्मत को भी तरग़ीब दी कि आशूरा का रोज़ा रखने से अल्लाह ताअला एक साल के गुनाह माफ़ फ़र्मा देगा और यहूदीयों की मुख़ालिफ़त के लिए फ़रमाया कि अगर में आइन्दा साल ज़िंदा रहा तो 9 मुहर्रम का भी रोज़ा रखूंगा ।

इसी लिए उलमाए किराम ने अहादीस शरीफा की रोशनी में फ़रमाया है कि अफ़ज़ल ये है कि 9 और 10 मुहर्रम-उल-हराम का रोज़ा रखा जाये यह 10 और 11 का ,अगर कोई शख़्स दो दिन रोज़ा ना रख सके तो एक दिन भी कम अज़ कम रोज़ा रखने का एहतिमाम करना चाहीए कि ये दुसरे नफ़ल रोज़ों के मुक़ाबले में निहायत अज्र-ओ-सवाब का बाइस है ।

उन्हों ने कहा कि यौम ए आशूरा की एहमियत इस बात की मुतक़ाज़ी है कि उस दिन रोज़ा रखा जाये और इस दिन को ज़िक्र ख़ुदावंदी में गुज़ारा जाये ।

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