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रमज़ान में मुस्लिम फ़ुट बॉलर्स का इमतिहान

फुटबॉल वर्ल्ड कप का नाक आउट मरहला माह रमज़ान के साथ ही शुरू हुआ है और ऐसे में मेगा ईवंट खेलने वाले मुसलमान खिलाड़ियों को ये फ़ैसला करना है कि वो रोज़े रखें या नहीं। इस वक़्त फ़्रांस, जर्मनी, स्विटज़रलैंड, बेल्जियम, अल्जीरिया और नाईजीरिय

फुटबॉल वर्ल्ड कप का नाक आउट मरहला माह रमज़ान के साथ ही शुरू हुआ है और ऐसे में मेगा ईवंट खेलने वाले मुसलमान खिलाड़ियों को ये फ़ैसला करना है कि वो रोज़े रखें या नहीं। इस वक़्त फ़्रांस, जर्मनी, स्विटज़रलैंड, बेल्जियम, अल्जीरिया और नाईजीरिया दूसरी टीमों में मुसलमान फुटबॉलर शामिल हैं।

माहिरीन तिब्ब के मताक़ रोज़े की हालत सख़्त कंट्रोल में ख़ुराक लेने वाले महंगे और पेशावर फुटबालरों के जिस्मों के लिए तबाहकुन साबित हो सकती है, बिलख़सूस मेज़बान मुल्क ब्राज़ील के गर्म और मर्बूत‌ मौसम में ये फैसला खिलाड़ियों के लिए नुक़्सानदेह है। इस हवाले से अल्जीरिया के कोच वाहिद हलील होडच का कहना है हम यहां ब्राज़ील में फुटबाल खेलने आए और हम सफ़र में हैं।

जबकि फ़्रांस और स्विटज़रलैंड की टीम इंतिज़ामिया ने अपने मुसलमान खिलाड़ियों के कोई अलाहदा एहतिमाम नहीं किया है जिसका मतलब यही लिया जा सकता है कि मज़कूरा खिलाड़ी वर्ल्ड कप के दौरान रोज़े नहीं रखेंगे। दूसरी जानिब इंग्लिश इंस्टीटियूट आफ़ स्पोर्टस में काम करनेवाली माहिर ग़िजाईयत ईमा गार्डनर के असल चैलेंज रोज़ाना की बुनियाद पर हाएडरीशन और तवानाई को बरक़रार रखना है।

रमज़ान में, बिलख़सूस इसके इबतिदाई हिस्से के दौरान, रोज़े दारों के पट्ठों का साइज़ कम हो सकता है। दूसरी जानिब फ़ीफ़ा के चीफ़ मेडीकल ओहदेदार जेरी वराक़ कह चुके हैं कि रोज़ा रखने वाले खिलाड़ियों की जिस्मानी साख्त में तबदीली नहीं आनी चाहिए। वराक़ के मुताबिक़ उन्होंने रमज़ान के दौरान खिलाड़ियों पर जामि तहक़ीक़ की थी और इसके ज़रिया मालूम हुआ कि अगर माह रमज़ान मुनासिब तरीक़े से गुज़ारा जाये तो खिलाड़ियों की जिस्मानी कारकर्दगी में कमी नहीं आती।

ज‌र्मनी के मीसोट ओज़ल ज़हन बना चुके हैं। इनका कहना है कि रमज़ान हफ़्ता से शुरू होगा लेकिन वो काम की वजह से रोज़े नहीं रखेंगे। माहिर ग़िजाईयत गार्डनर माज़ी में एक बड़े टूर्नामेंट के दौरान रोज़े रखने वाले बर्तानवी हाकी टीम के एक खिलाड़ी के साथ काम कर चुकी हैं। गार्डनर नेइस तजुर्बा को एक केस स्टडी क़रार दिया।

उन्होंने रोज़े की शिद्दत कम करने के हवाले से कहा कि वर्ल्ड कप के दौरान रोज़े रखने वाले खिलाड़ियों के मैच उमूमन शाम में इफ़तार के क़रीब शुरू होंगे। इंग्लिश फुटबॉल कलब ब्लैकबर्न रोवरज़ के साथ माज़ी में काम करनेवाली गार्डनर के मुताबिक़ कुछ खिलाड़ी रोज़े के दौरान कुल्ली करने को तर्जीह देते हैं क्योंकि एक रिसर्च के तहत मुताबिक़ ऐसा करने के कुछ फ़ायदे हैं।

कुल्ली करने से खिलाड़ियों को ऐसा महसूस होता है जैसे वो पानी पी रहे हों। इस के इलावा खिलाड़ी ख़ुद को गर्मी से बचाने के लिए ठंडे तौलिए भी इस्तिमाल करते हैं। जिस्म में पानी की कमी खेल पर असरअंदाज़ होती है और वज़न के तनासुब से जिस्म के अन्दर पानी का महज़ एक से दो फ़ीसद ज़ाए होने से खिलाड़ी के लिए तवज्जो देना मुश्किल हो जाता है।

ताहम, गार्डनर का कहना है रोज़ा रखने वाले खिलाड़ियों के लिए बेहतर होगा कि वो अपने कोच से सलाह‌ करें ताकि उन की जिस्मानी कारकर्दगी और तवानाई की बहाली के लिए मुनासिब पेशगी मंसूबा बंदी की जा सके। गार्डनर ने ऐसे खिलाड़ियों को मश्वरा दिया कि वो दिन में सिर्फ़ एक मर्तबा ही प्रेक्टिस करें। तहक़ीक़ के हवाले से देखें तो ऐसे खिलाड़ियों के लिए सुबह सवेरे या फिर रात को देर गए प्रेक्टिस करना बेहतर होगा।

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