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रांची को चाहिए मास्टर प्लान

अगले 25 साल की जरूरतों को सेंट्रल में रख कर बन रहे रांची का मास्टर प्लान-2037 की बुनियाद में ही क्रैक (दरार) है। हुकूमत की वाजेह सोच, बसीरत और पुख्ता ख्वाहिस ताकत की कमी में, यह दो साल में भी जमीन पर नहीं उतर सका। अगले और कई महीनों में यह बन

अगले 25 साल की जरूरतों को सेंट्रल में रख कर बन रहे रांची का मास्टर प्लान-2037 की बुनियाद में ही क्रैक (दरार) है। हुकूमत की वाजेह सोच, बसीरत और पुख्ता ख्वाहिस ताकत की कमी में, यह दो साल में भी जमीन पर नहीं उतर सका। अगले और कई महीनों में यह बन ही जाएगा, इसकी कहीं कोई गारंटी नहीं है।

हुकूमत के सबसे ऊपर बैठे लोग और जानकार भी इसे कुबूल कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मास्टर प्लान बन रहा है, वक़्त की मुद्दत के अंदर यह बन ही जाए, इसके लिए वे जिम्मेवार कहां हैं? क्योंकि इसके लिए किसी बॉडी और अफराद को सीधा जिम्मेवार ही नहीं बनाया गया है। लिहाजा, मुक़ामी जरूरत को देखते हुए मास्टर प्लान का लंबा होता इंतजार अब खलने लगा है।

मास्टर प्लान से क्यों बढ़ेगी तरक़्क़ी की रफ्तार
तेजी से हो रहा शहरी तरक़्क़ी मास्टर प्लान बनने के सेंटर में है। शहर की तारीफ के मुताबिक वैसा ज़मीन का हिस्सा जहां 75 फीसद आबादी गैर ज़ीराअत काम की बुनियाद पर रिज्क में शामिल हो। जमीन कम और अफ़ादियत मजीद होती जा रही है। इसलिए कंट्रोल तरक़्क़ी और ज़मीन अफ़ादियत को देखते हुए कानूनी जवाबदेही तय करना मास्टर प्लान की पहली शर्त है।

पहले कब बना

1983 में हुई प्लानिंग गैर मुंकिस्म बिहार में साल 1983 में रांची के लिए पहला मास्टर प्लान बना था। वह 20 सालों की जरूरत को देखते हुए बनाया गया था। इसकी मुद्दत साल 2003 में ही खत्म हो चुकी है। उस मास्टर प्लान के तजवीजों का 10 फीसद भी अमल नहीं हुआ। इसलिए शहर के लिए नया मास्टर प्लान बने, यह सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।

काम कैसे किया जाए देखने वाला कोई नहीं
मास्टर प्लान बनने की अमल में दिलचस्प हक़ीक़त यह भी है कि इसकी मॉनिटरिंग के लिए कोई टेक्निकल बॉडी नहीं बनी। कभी चीफ़ सेक्रेटरी ने बुलाकर प्रेजेंटेशन लिया, तो कभी वज़ीरे आला ने हाई पावर प्रेजेंटेशन की हिदायत दिया। कभी शहर तरक़्क़ी महकमा ने रिपोर्ट देखी, तो कभी टाउन प्लानर हाल-चाल लेते रहे। नतीजा हुआ कि एक साल में बनने वाला मास्टर प्लान, दो साल बाद भी जमीन पर नहीं उतरा।

शुरू से ही दिखी गड़बड़ी

आवाम की जरूरत को देखते हुए हुकूमत ने मास्टर प्लान बनाने का फैसला किया, मगर कोई तारीख तय नहीं की। गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से हुई। इस लाइन को तय करने के बाद सारी जिम्मेदारी कंसल्टेंट की हो जाती है। इसमें वह कई चीजों का सर्वे होता है। सर्वे रिपोर्ट की बुनियाद पर ही कंसल्टेंट मास्टर प्लान को हत्मी शकल देता है। रांची का मास्टर प्लान बनाने के लिए जनवरी 2012 में जिस फीडबैक इंफ्रा को कंसल्टेंसी का काम दिया गया, सरकारें बदलने के साथ-साथ उसकी सोच और ज़ेहनीयत भी बदलती रही। एजेंसी को काम की आज़ादी नहीं मिली। ऊपर लेबल पर बैठे लोगों की ज़ेहनीयत के हिसाब से प्लान का खाका भी बदलता रहा।

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