Friday , August 17 2018

राजपूत घराना की तालीमयाफ्ता ( शिक्षित ) लड़की मधु रानी ने ली दामन -ए- इस्लाम में पनाह

नुमाइंदा ख़ुसूसी-ठाकुर प्रहलाद सिंह अपनी बेटी मधु रानी (36 साला) को समझा रहे थे कि देखो, तुम ने जो फैसला किया है इंतिहाई ग़लत है। अपने दिल-ओ-दिमाग़ से उसे निकाल फेंको। तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। डैडी की मुहब्बत, माँ की मामता और भाई ब

नुमाइंदा ख़ुसूसी-ठाकुर प्रहलाद सिंह अपनी बेटी मधु रानी (36 साला) को समझा रहे थे कि देखो, तुम ने जो फैसला किया है इंतिहाई ग़लत है। अपने दिल-ओ-दिमाग़ से उसे निकाल फेंको। तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। डैडी की मुहब्बत, माँ की मामता और भाई बहनों का प्यार तुम्हें दुबारा मिल जाएगा। बाप का ग़ुस्सा, उस की धमकियां और भाई बहनों के मश्वरों का मधु रानी पर कोई असर नहीं हो रहा था। आख़िर प्रहलाद सिंह ने अपनी बेटी से कहा देखो, इस्लाम से तुम्हारी दिलचस्पी से अंदाज़ा होता है कि तुम इस्लाम क़बूल करके ही दम लोगी, लेकिन सुनो! अगर तुम्हें अपना मज़हब तब्दील ही करना हो तो फिर ईसाई बन जाओ, बुद्धिस्टों का मज़हब इख़तियार करलो, सन्यास ले लो, राहिबा (जोगन) बन जाओ, लेकिन मुस्लमान हरगिज़ ना बनना।

मैं इस्लाम और मुस्लमानों के बारे में बहुत कुछ जानता हूँ। इस मज़हब में औरत का कोई मुक़ाम(स्थान) नहीं। उसे घर की लौंडी समझा जाता है। इस में तशद्दुद ( हिंसा ) आम सी बात है, अख़लाक़-ओ-किरदार(अच्छे चरित्र -ओ-व्यव्हार) का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता। इस्लाम क़बूल करके तुम बहुत पछताओगी और अगर तुम इस्लाम क़बूल करने पर बज़िद ही हो तो सुनो, अगर तुम ने ऐसा किया तो फिर मैं तुम्हें ख़त्म कर दूँगा। ठाकुर प्रहलाद सिंह की ब्रहमी और इस्लाम के मुताल्लिक़ उनके फ़र्सूदा(पुराने/जाहीलाना) ख़्यालात सुनने के बाद मधु ने जैसे ही बात शुरू की, प्रहलाद सिंह उनकी बीवी और बेटों के मुंह खुले रह गए। मधु रानी ने बड़े एतिमाद (भरोसे) और पूरे ईमानी से प्रहलाद सिंह के हर शुबा, अंदेशा और सवाल का जवाब दिया और कहा कि अगर इस रुए ज़मीन(पृथ्वी) पर औरत को एहतिराम-ओ-इज़्ज़त का मुक़ाम किसी मज़हब ने अता किया है तो वो सिर्फ़ इस्लाम है।

पैग़ंबर इस्लाम, मुहसिन इंसानियत (मानवता का प्रतिनिधित्व करने वाला), हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम ने दुनिया को ये बता दिया कि देखो, औरत माँ की शक्ल में तुम्हारे लिए सब से बड़ी नेअमत(कृपा), बहन की शक्ल में मुहब्बत, बीवी की शक्ल में राहत है और माँ के क़दमों के नीचे जन्नत(जन्नत) है। इस तरह पैग़ंबर इस्लाम सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम ने औरत को तक़द्दुस-ओ-हुर्मत और वक़ार (पवित्रता ओ गरिमा) की मेराज (बुलंदी) पर पहुंचा दिया। औरत इस्लाम में घर की लौंडी नहीं बल्कि मलिका होती है और जहां तक तशद्दुद ( हिंसा ) की बात है, इस्लाम ने दुनिया को अमन-ओ-आश्ती(अमन ओ सद्भावना) का पयाम दिया है। इस मज़हब के दूसरे मानी ही अमन-ओ-सलामती है।

इस्लाम ने एक इंसान के क़त्ल को सारी इंसानियत (मानवता) का क़त्ल क़रार दिया है। ज़ुलम-ओ-बरबरीयत से मना किया है। इस मज़हब की अमन दोस्ती का इस से बढ़ कर और क्या सबूत हो सकता है कि, इस ने इंसान तो दूर की बात है, सरसब्ज़-ओ-शादाब दरख़्तों (हरे पेड़ पौधों) को काटने, बेज़ुबान जानवरों पर ज़्यादा बोझ डालने, दूसरों को बुरा कहने, यहां तक कि जंग के दौरान ज़ईफ़ों, बीमारों, औरतों और बच्चों पर किसी जबर(उत्पीड़न) से मना किया है। डैडी! आप इस्लाम को अख़लाक़-ओ-किरदार(अच्छे चरित्र -ओ-व्यव्हार) से ख़ाली मज़हब क़रार देते हैं तो सुनिए दीन इस्लाम ने अपने मानने वालों पर अख़लाक़-ओ-किरदार(अच्छे चरित्र -ओ-व्यव्हार) के लिए ज़ोर दिया है। ख़ुद पैग़ंबर इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम का इरशाद मुबारक (उपदेश) है तुम में से बेहतरीन शख़्स वो है जिस के अख़लाक़ बेहतर हूँ। जो मज़हब दरख़्तों और जानवरों से तक छेड़ छाड़ से मना करता है तो उसे आप अख़लाक़-ओ-किरदार(अच्छे चरित्र -ओ-व्यव्हार) से आरी(रिक्त) क़रार कैसे दे सकते हैं।

आप का इस तरह कहना दरअसल तास्सुब और नफ़रत के बाइस(वजह से) है और जहां तक आप ने मुझे ख़त्म करने की धमकी दी है तो सुनिए! आज आप ख़ुद को तरक़्क़ी याफ़ता अख़लाक़-ओ-किरदार का पैकर क़रार देते हुए भी अपनी ही बेटी को ख़त्म करने की बातें कर रहे हो और हमारे नबी सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम ने तकरीबन 1500 साल क़ब्ल लड़कियों को ज़िंदा दफ़न होने से बचा लिया। यही वजह है कि इस्लाम में लड़कियों और औरतों को वक़ार-ओ-हुर्मत का मुक़ाम हासिल है। प्रहलाद सिंह और उन के दीगर अरकान ख़ानदान मधु रानी के इन ख़्यालात पर दंग रह गए और फैसला किया कि वो ज़बरदस्ती की बजाय प्यार-ओ-मुहब्बत से समझाएंगे।

इस तरह कई दिन तक वो मधु रानी को समझाते रहे, लेकिन अल्लाह जिसे चाहता है, हिदायत देता है और ईमान जैसी अनमोल लाकीमत(अनमोल) नेअमत अपने महबूब बंदों को अता कर ही देता है और ऐसा ही रहम-ओ-करम ठाकुर मधु रानी पर अल्लाह ने किया और आज वो एक सच्चे मुस्लमान की शक्ल में हमारे सामने मौजूद है और उसे उम्मीद है कि एक ना एक दिन उनके माँ बाप-ओ-भाई बहन ज़रूर दामन इस्लाम में पनाह लेंगे। क़ारईन ( पाठकों ) ! आप सोच रहे होंगे कि आख़िर अपने हरदिल अज़ीज़ वालिद से इस तरह की बहस करनेवाली जाँबाज़ लड़की मधु रानी आख़िर कौन है? तो आप को बतादें कि 36 साला ठाकुर मधु रानी बिंत ठाकुर प्रहलाद सिंह रीटाईर्ड सरकारी मुलाज़िम की बड़ी बेटी हैं। ये दरअसल राजपूत घराना से ताल्लुक़ रखती हैं। उन्हें दो भाई और दो बहनें हैं।

मधु रानी ने तीन साल क़ब्ल दामन इस्लाम में पनाह ली है और उन का कहना है कि इस्लाम की आग़ोश में पहुंच कर उन्हें ऐसा सुकून और ईमान की ऐसी हलावत नसीब हुई है जिसे अलफ़ाज़ में बयान ही नहीं किया जा सकता। राक़िम उल-हरूफ़ (संवाददाता) से बात चीत करते हुए ख़दीजा (साबिक़ नाम मधु रानी) ने बताया कि इन की पैदाइश वरंगल में हुई। इन के एक भाई ने एम बी ए किया है जब कि दूसरा दुबई में नेटवर्क इंजीनियर है। छोटी बहन की शादी हो चुकी है। उन्हों ने बी काम के बाद जेकलान इंफोटेक कंपनी में मुलाज़मत की और 8 साल वहां बरसर ख़िदमत रहीं। इन की तनख़्वाह 25 हज़ार रुपय थी। ताहम कुछ रोज़ क़ब्ल उन्हों ने मुलाज़मत को ख़ैरबाद कह दिया है। इस्लाम क़बूल करने के अस्बाब-ओ-वजूहात पर रोशनी डालते हुए ख़दीजा ने बताया कि दामन इस्लाम तक पहुंचने में इन की किसी एक शख़्स ने नहीं बल्कि कई अफ़राद ने मदद की है।

वैसे उन्हों ने हिन्दू मज़हबी किताबों और कुरान-ए-मजीद के गहरे मुताला और ग़ौर-ओ-फ़िक्र ( विशलेषण ) के बाद इस्लाम क़बूल करने का फैसला किया और वो समझती हैं कि अल्लाह जिस बंदा पर रहम-ओ-करम करना चाहता है, उसे हिदायत नसीब फ़रमाता है और वो मुस्लमान हो कर ख़ुद को दुनिया की सब से ख़ुशकिसमत ख़ातून समझती हैं। एक सवाल के जवाब में उन्हों ने बताया कि जहां वो काम करती थीं, वहां मुस्लमान भी मुलाज़िम थे और उन साथियों का नमाज़ पढ़ना ख़दीजा को अच्छा लगता था और मुझे हैरत होती थी कि मुस्लमान अज़ान के साथ ही अपने रब की बारगाह में सजदा रेज़ होने बेचैन हो जाते हैं। बाजमाअत (एक साथ) नमाज़ों की अदाएगी के मुनाज़िर देख कर वो काफ़ी प्रभावित (मुतास्सिर) हुईं। ख़दीजा ने ये भी बताया कि अगरचे वो कट्टर हिन्दू ख़ानदान में पैदा हुईं, लेकिन इबतदा ही से उन्हें कई ख़दाओं की पूजा अच्छी नहीं लगती थी।

हिन्दुओं में एक दिन का बरत यानी रोज़ा भी रखा जाता था, लेकिन मुस्लमान जिस अंदाज़ में रोज़े रखा करते, उस की कैफ़ियत, अंदाज़ और मज़ा ही कुछ और होता। मुस्लमान सारा दिन अल्लाह की रज़ा के लिए नफ़स पर कंट्रोल करते, पांचों वक़्त की नमाज़ अदा करते और इबादतों में मशग़ूल रहते। साथ ही गरीबों, मिस्कीनों और यतीमों के साथ नरमी से पेश आते। मुस्लमानों के ये ऐसे काम थे जिस से वो काफ़ी प्रभावित (मुतास्सिर) हुईं। अपने क़बूल इस्लाम की मज़ीद तफ़सीलात बताते हुए ख़दीजा ने कहा कि हिन्दू धर्म में तकरीबन लोग भगवत गीता, रामायन और महाभारत जैसी मज़हबी किताबों से वाक़िफ़ ही नहीं बल्कि जो भी टी वी सीरियलों में बताया जाता है, उसे क़बूल कर लेते हैं। इस्लाम और हुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम के बारे में हिन्दू मज़हबी किताबों में आए ज़िक्र के हवाले देते हुए ख़दीजा ने बताया कि हिन्दू धर्म की तमाम किताबों में हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम का बार बार ज़िक्र है। इन किताबों में अल्लाह की वहदानियत (oneness) का ज़िक्र है।

भगवत गीता में हुज़ूर सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम के ज़िक्र मुबारक का हवाला देते हुए ख़दीजा ने बताया कि भगवत गीता में हुज़ूर सल्लल्लाह अलैहे वसल्लम के ज़िक्र के साथ ये कहा गया है कि जब ज़मीन पर बुराई फैल जाती है तब ऊपर वाला अपने नबी को भेज कर बुराईओं का ख़ातमा करता है और ये नबी लोगों में नेकी की दावत देता है। ख़दीजा ने सिर्फ बैठे बैठे यह किसी के मश्वरा पर इस्लाम क़बूल नहीं किया बल्कि उन्हों ने कई बरसों तक हिन्दू मज़हबी किताबों का बग़ौर मुताला किया, जिस के बाद उन के ज़हन में कई सवालात उभरने लगे और ये सोच कर उन की बेचैनी बढ़ गई कि आख़िर वो ख़ुद कौन हैं? और उन का मक़सद हयात किया है? लेकिन जब उन्हों ने कुरान-ए-मजीद का मुताला शुरू किया तो उसे लगा जैसे तमाम उलझनों का हल मिल गया हो।

हक़ीक़त में उन्हें उन के सवालात के जवाबात मिल ही गए। ख़दीजा के मुताबिक़ उन्हों ने तीन बरस क़ब्ल ख़ामोशी से कलिमा पढ़ा और छुपछुप कर इबादत करती रहीं। चोरी चोरी रोज़े भी रहा करतीं, लेकिन उन के मुस्लमान होने पर घर में रहना मज़ीद मुश्किल होता जा रहा था। एक भाई ने तो बहुत समझाने की कोशिश की कि अपने मज़हब पर क़ायम रहो। इस ने ये भी कहा कि देखो, मेरे भी कई दोस्त मुस्लमान हैं। इस के बावजूद मैं मुस्लमान नहीं हुआ। तुम इस्लाम क़बूल करके बड़ी ग़लती कर रही हो। अगर तुम इस्लाम क़बूल करती हो तो मुआशरे(समाज) में हमारी नाक कट जाएगी और हम किसी को मूँह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे। बहरहाल इन मुश्किलात को देख कर 20 मार्च 2012 को घर में एक चिट्ठी छोड़कर ख़दीजा अपनी मर्ज़ी से निकल गईं। इस चिट्ठी में उन्हों ने वाज़िह तौर पर लिखा इस्लाम की ख़ातिर में अपना घर बार छोड़ रही हूँ।

ख़दीजा के मुताबिक़ उन्हों ने ख़ानदान में ये साफ़ तौर पर कह दिया कि अगर वो किसी दोस्ती यह आशिक़ी में मुबतला होकर इस्लाम क़बूल कर रही हूँ तो ये ग़लत है बल्कि आठ साल तक गहराई से मुताला, तदब्बुर और तफ़क्कुर के बाद दामन इस्लाम में पनाह ली है।एक और इस्तिफ़सार पर ख़दीजा का कहना था कि वो अख़बार सियासत के ज़रीया ये कहना चाहती हैं कि वो एक समझदार, पढ़ी लिखी लड़की हैं और बड़े ही ग़ौर-ओ-फ़िक्र, मज़हबी किताबों के तफ़सीली मुताला(in detailed study) और मुस्लमानों के अमल-ओ-हरकात और मुआमलात के मुशाहिदा के बाद ही अपनी मर्ज़ी-ओ-मंशा से इस्लाम क़बूल किया है और वैसे भी अपनी पसंद का मज़हब इख़तियार करने की ख़ुद हमारे मुल्क का दस्तूर इजाज़त देता है। ख़दीजा के मुताबिक़ आज वो जिन हालात से गुज़र रही हैं, उन्हें अल्लाह से पूरी उम्मीद है कि वो जल्द बेहतर हो जाएंगे। ख़दीजा ने ये भी बताया कि घर से निकल जाने पर उन के वालिदैन ने पुलिस में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करवाई है। पुराने शहर में मुक़ीम ख़दीजा का अपनी शादी के बारे में कहना है कि हालात मामूल पर आने के बाद इंशाअल्लाह वो शादी कर लेंगी।

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