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राजीव गांधी के क़ातिलों को फांसी देना गैर आईनी होगा: साबिक़ जज

थरवनंथा पूरम, 26 फरवरी: साबिक़ जज के टी थॉमस जिन्होंने साबिक़ वज़ीरे आज़म राजीव गांधी क़त्ल मुक़द्दमे की समाअत सुप्रीम कोर्ट बेंच के सरबराह की हैसियत से 13 साल पहले की थी और तीन मुल्ज़िमीन की सज़ाए मौत की तौसीक़ की थी, अचानक अपना लहजा तब्दी

थरवनंथा पूरम, 26 फरवरी: साबिक़ जज के टी थॉमस जिन्होंने साबिक़ वज़ीरे आज़म राजीव गांधी क़त्ल मुक़द्दमे की समाअत सुप्रीम कोर्ट बेंच के सरबराह की हैसियत से 13 साल पहले की थी और तीन मुल्ज़िमीन की सज़ाए मौत की तौसीक़ की थी, अचानक अपना लहजा तब्दील करते हुए कहा इक्का तीनों मुल्ज़िमीन की सज़ाए मौत पर अब अमल आवरी करना गैर आईनी होगा, क्योंकि आज तक उनके केस पर कोई ग़ौर-ओ-ख़ौज़ ही नहीं किया गया और उन्होंने 22 साल जेल की सलाखों के पीछे गुज़ार दिए।

जस्टिस थॉमस ने जिन्होंने सहि रुकनी बेंच की क़ियादत की थी, पी टी आई से बात करते हुए कहा कि राजीव गांधी कत्ल केस के मुल्ज़िमीन की कोई नफ़सियाती जांच पड़ताल सिरे से की ही नहीं गई। ये जानने की कोशिश नहीं की गई कि आख़िर मंतक़ी तौर पर वो क्या चाहते थे और उन्होंने क़त्ल जैसे जुर्म का इर्तिकाब क्यों किया।

लिहाज़ा इतनी ज़्यादा मुद्दत गुज़र जाने के बाद उन्हें फांसी पर लटकाना एक गैर आईनी फे़अल होगा। अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि 2010 में जस्टिस एस बी सिन्हा की क़ियादत में बरियार मुआमला में जब सज़ाए मौत का फैसला सुनाया गया तो उस वक़्त मुल्ज़िम के शख़्सी किरदार पर भी ग़ौर-ओ-ख़ौज़ किए जाने की ज़रूरत थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

दूसरी अहम बात है कि तीनों मुल्ज़िमीन मोरो गुण, सनथान और पैरा रियोसन ने 20 साल से ज़ाइद का अर्सा जेल में गुज़ार दिया है। सज़ाए उम्र कैद पाने वाले कैदियों के लिए भी ये ज़रूरी होता है कि उन के केस पर नज़र-ए-सानी की जाये। ये कैदियों का हक़ होता है जबकि इन मुल्ज़िमीन के साथ ऐसा नहीं हुआ। चूँकि ये कैदी सज़ाए मौत पाने वाले कैदी थे लिहाज़ा उन के केस पर सिरे से नज़र-ए-सानी नहीं की गई जिस से वो इस बुनियादी हक़ से महरूम रह गए जो दीगर कैदियों को उन के केस पर नज़रसानी करते हुए हासिल होता है।

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