राम के नाम पे भारतीय जनता पार्टी बटोरना चाहती है वोट

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यह हफ्ता सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इसमें दीपोत्सव है। इसका महत्व इसलिए बढ़ गया है कि इसके जरिए बीजेपी 2019 के लिए अपनी सियासी उम्मीदों को रोशन करने की बड़ी तैयारी कर रही है। पार्टी की मंशा यह है कि राम मंदिर बनाने की नए सिरे से उठी मांग के बीच वह हिंदुओं में दीपावली के बहाने अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करे। यही कारण है कि आम चुनाव से 6 महीने पहले आई इस दीपावली को भव्यतम बनाने के लिए पुरजोर कोशिशें की जा रही है। इस बार भी इसका केंद्र अयोध्या को बनाया गया है।

ऐसी खबरें हैं कि उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ 328 फीट की भगवान राम की मूर्ति बनाने का ऐलान करेंगे। सरयू तट पर बनने वाली इस मूर्ति पर लगभग 400 करोड़ रुपयों की लागत आएगी। इस मूर्ति को बनाने में कार सेवा करने का भी आह्वान किया जा सकता है। इसके अलावा बुधवार को दीपावली के अवसर पर अयोध्या में भव्य आयोजन तो होगा ही, जिसमें दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति की पत्नी शामिल होंगी। वहां कई सारे विदेशी कलाकार भी आ रहे हैं और बड़े पैमाने पर रंगारंग कार्यकम का भी आयोजन होगा।

वहीं पूरे देश में कई बीजेपी नेता राम मंदिर के नाम पर एक दीप जलाने का संदेश दे रहे हैं। सभी बीजेपी सांसदों को दीवाली के मौके पर अपने इलाके में लोगों के बीच रामराज्य आ जाने की आहट का संदेश प्रचारित करने को कहा गया है। सूत्रों के अनुसार दीपावली के मौके पर ही पीएम मोदी केदारनाथ मंदिर भी जा सकते हैं।

हिंदू और राष्ट्र की खिचड़ी

इस तरह दीपावली के मौके पर बीजेपी की पूरी कोशिश है कि देश में राम मंदिर के नाम पर हिंदूवाद की भावना को नए सिरे से सामने लाए, जिसके दम पर न सिर्फ अगले 6 महीने तक उसका चुनावी अभियान चले, बल्कि चुनाव में उसे इसका लाभ भी मिले। पार्टी को लग रहा है कि जिस तरह का माहौल अब बन रहा है, वह 1992 के राम मंदिर आंदोलन के माहौल की तरह ही है। यह सब तब हो रहा है, जब पिछले हफ्ते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने मुंबई में अपनी उच्चस्तरीय मीटिंग के बाद कहा कि मंदिर के मुद्दे पर आरएसएस ने भी 1992 की तरह देशव्यापी आंदोलन चलाने का ऐलान किया है।

ध्यान रहे, तब 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिरा दिया गया था। दशहरे के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी राम मंदिर के लिए कानून बनाने की वकालत की थी। पिछले हफ्ते गुरुवार को मुंबई में हुई उस मीटिंग में बीजेपी प्रेजिडेंट अमित शाह भी शामिल हुए थे। सूत्रों के अनुसार उस मीटिंग में मंदिर मुद्दे को आगे किस तरह बढ़ाया जाएगा, इस मसले पर भी चर्चा हुई। पिछले कुछ दिनों से जिस तरह नए राजनीतिक संकेत आए हैं, उससे तय हो गया है कि बीजेपी 2019 के आम चुनाव में अपने प्रचार का मुख्य फोकस हिंदूवाद और राष्ट्रवाद के मिश्रण को ही रखने वाली है। बीजेपी पहले ही अरबन नक्सल और टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल राष्ट्रवाद को उभारने के लिए करती रही है।
चुनौती संतुलन साधने की

दरअसल राम मंदिर के मुद्दे पर मोदी सरकार अभी काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति में है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह संकेत मिलने के बाद कि मुद्दे पर फैसला आम चुनाव से पहले आने की उम्मीद नहीं के बराबर है, सरकार पर कानून बनाने का दबाव बढ़ने लगा है। तमाम हिंदूवादी संगठन भी अब खुलकर कहने लगे हैं। यह सब बीजेपी के कोर वोटर हैं। ऐसे में सरकार और पार्टी के लिए इनकी मांगों को अनदेखा करना आसान नहीं होगा। वहीं खुद शासन में रहते हुए कोई फैसला लेना भी आसान नहीं होगा, क्योंकि उसके प्रभाव बहुआयामी हो सकते हैं। साथ ही राम मंदिर मुद्द उभरने के बाद काउंटर एफेक्ट भी हो सकते हैं।

जेडीयू और अकाली जैसे सहयोगी भी इस बारे में बीजेपी को इशारों में चेता चुकी है। यही कारण है कि फिलहाल सरकार और पार्टी की मंशा है कि वह खुद को लोगों की भावनाओं के साथ रखते हुए यह जताने की कोशिश करे कि जो भी अड़चन है, वह कोर्ट की तरफ से है, उनकी तरफ से नहीं है। पिछले दस दिनों के अंदर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और संघ, दोनों ने परोक्ष रूप से न्यायपालिका से जनभावना और आस्था को दरकिनार नहीं करने का आग्रह किया था। यह भी उसी कोशिश का एक हिस्सा था। इसी बीच दिल्ली में संतों ने सम्मेलन कर इस मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाया है। बीजेपी के नेता मानते हैं कि जिस तरह का दबाव है और जैसी अपेक्षाएं हैं, अब वहां से पीछे लौटना किसी भी तरह से मुमकिन नहीं

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