Friday , December 15 2017

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामला: टाइम्स लिट् फेस्टिवल में सुर से सुर मिलाते नजर आये स्वामी और ओवैसी

नई दिल्ली: एक दूसरे के कट्टर विरोधी माने जाने वाले बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी और AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी आज कल एक दूसरे के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं। इस बात की उदारण देखने को मिली दिल्ली में चल रहे टाइम्स लिटफेस्ट के दौरान जहाँ इन दोनों नेताओं ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करने की बात को अंतिम फैसला मानने की बात पर हामी भरी और एक दूसरे से हाथ मिलाया है। यही नहीं ओवैसी और स्वामी ने वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा नोटबंदी मामले पर लिए गए फैसले पर भी एक दुसरे की हाँ में हाँ मिलाते हुए उनमें अविश्वास जताया है।

दिल्ली में चल रहे टाइम्स लिटफेस्ट में पहुंचे स्वामी ने कहा कि मैं कोर्ट के फैसले को स्वीकार करता हूँ चाहे वह जो मर्जी हो और ओवैसी ने भी यही बात कही। इस मुद्दे पर बात करते हुए स्वामी ने कुछ दलीलें दी लेकिन इस बार ओवैसी द्वारा कही गई बातें उन पर भारी पड़ गई। स्वामी जहाँ अपनी बात को सही मनवाने के लिए कोर्ट और सरकारों द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों के पालन करने की बात का सहारा ले रहे थे वहीँ ओवैसी इस बात पर टिके रहे कि सरकार या कानून के दिशा-निर्देश मानव अधिकारों से ऊपर नहीं हरगिज़ नहीं हो सकते।

स्वामी का कहना था कि हिन्दू सभ्यता हमेशा से ही दूसरी सभ्यताओं के साथ मिल जुल कर रहता आ रही है। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि देश में आने वाली हर बाहरी सभ्यता चाहे वो यहूदी हों या कोई और सभी का स्वागत किया गया है। स्वामी की इस बात पर सवाल उठाते हुए राजदीप सरदेसाई ने स्वामी पुछा कि क्या ४-५ सदियों पहले हुए अत्याचार का आज बदला लेना जरूरी है?? सरदेसाई के इस सवाल पर स्वामी कोई जवाब न दे पाए। स्वामी ने अपनी परिवार में सभी धर्मों के रिश्तों के बारे में बताते हुए कहा कि वह सांप्रदायिकता में विश्वास नहीं रखते। लेकिन भारत एक हिन्दू मेजोरिटी वाला देश है और लोग इस बात पर विश्वास करते हैं कि राम का जन्म यहीं हुआ था। जिसपर आपत्ति जताए हुए ओवैसी ने कहा कि हिन्दू धर्म की मेजोरिटी वाली बात ही गलत है क्योंकि यहाँ सिर्फ बहुसंख्यकों के हिसाब से ही नियम बना दिए जाते हैं और अल्पसंख्यकों की बात पर गौर नहीं किया जाता। इसके साथ यूपी चुनावों पर ओवैसी ने कहा कि बीजेपी इन चुनावों में यूसीसी और गौहत्या का मुद्दा उठाकर वोट हासिल करना चाहती है।

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