Saturday , November 18 2017
Home / International / रोहिंग्या मुसलमान बड़े पैमाने पर नरसंहार के करीब

रोहिंग्या मुसलमान बड़े पैमाने पर नरसंहार के करीब

2016-10-11-1476222757-3293869-rohingya4-thumb

मैंने हाल के वर्षों में रोहिंग्यो के बारे कई अखबार में सिलसिलेवार लिखा और यहां तक कि बीते गर्मी में ‘द मोस्ट ऑप्रेस्ड पीपुल इन द वर्ड’ नाम से एक पुस्तक भी प्रकाशित कराया। पिछले दशकों में जो कुछ उनके साथ हुआ, खासतौर से पिछले कुछ वर्षों में, वह उनके जीवन का सबसे डरावना भाग है। इस जनसंहार के कारण आधे रोहिंग्या म्यांमार से विस्थापित हो कर चले गए है। जो बाकी हर गए उनके स्थिति उससे भी भयावह है। देश के अंदर अभी भी वो शिविरों में रहने को मजबूर हैं। यह बेहद डरावना हिस्सा है। लेकिन उसके आगे क्या किया जा सकता है।

उनके गृह नगर राखिने और आराकान में राष्ट्रवादी बौद्धों ने बहुत मार-काट और अत्याचार किया। पूरे म्यांमार संघ में  अब भी वैसे ही हालात बने हुए है जो पहले थे। रोहिंग्या एकमुश्त नरसंहार होने के कगार पर हैं। साल 2012 और 2013 से पहले इतने बुरे हालात कभी नहीं थे। इस घटना ने भारी नुकसान पहुचाया है और दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र में प्रवासन संकट को जन्म दे दिया है।मइससे पहले किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि राखिने के इलाको में यकायक इतने खतरनाक हालात पैदा हो जाएंगे। और किसी को पता नहीं था कि पुलिस और प्रशासन का रवैया इतना पक्षपाती हो जाएगा।

यह साफ है कि बिना राजनीतिक समर्थन के ऐसे काम अंजाम नहीं दिए जा सकते। 9 अक्टूबर को नौ पुलिस अधिकारियों की हत्या हो गई और बांग्लादेश बॉर्डर के पास कई सीमा सुरक्षा बल घायल हो गए। इस हमले के लिए रोहिंग्या समूदाय को दोषी ठहराया गया। हालांकि इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि हमलावर कौन थे। इस बात का किसी को पता नहीं कि इसे रोहिंग्यों ने किया या किसी दूसरे लोगों ने। बावजूद इसके पुलिस और सेना ने रोहिंग्यों के खिलाफ सबूत बनाना शुरू कर दिया। उसके बाद सोमवार को 24 निर्दोष रोहिंग्या लोगों की हत्या कर दी गई।

Rohingye people, a Muslim population, living in Rakhine State on the northwest coast of Burma have been restricted to their villages and placed in Internally Displaced Peoples (IDP) camps by the Burmese government. They have been the victims of persecution and communal violence by numbers of the Buddhist majority in Rakhine. International NGO's such as MSF have been expelled by the government, leading to a soaring crisis in health care. Brick kilns operated by Rohingya IDP's. Workers are IDP's. Adults are paid 2,000 kyat per day for about 10m hours of work. Children are paid 1,000 kyat per day. Children in photos are from age 6 to 8 and the oldest is 14. Thek Kay Pyin, 7, an IDP. His father is So Zokorice (small man in white tank top). He was falsely accused of murder and spent 1and 1/2 years in Sittwe Jail, beaten continuously for 8 months before being released without charges against him. Funeral of Ziada Begum, 30, who died of stomach diseasee. Left behind 5 children with no husband. Sham Shi Dar Begum, 18. TB and AIDS. Father died from AIDS. MOther Noor Johan, 50. Has seven daughters, all living in two small rooms in camp. Photograph by James Nachtwey.

इससे बुरा क्या होगा कि स्थानीय राज्य की एजेंसियों ने किसी भी प्रकार की न्यायिक मदद नहीं की। यहां तक की शांति की नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सूची की संघीय सरकार भी इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। रोहिंग्या इस बात की उम्मीद छोड़ चुके हैं कि उनकी मदद को कोई आगे आएगा। उनको अपनी खुद की सुरक्षा करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। यही कारण है कि हिंसा और तीव्र होती जा रही है, खासकर 2012 के बाद से। अगर रोहिंग्यो ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए संसाधन जुटाया तो सामूहिक रूप से कत्ल कर दिए जाएगें।

पिछले साल जब आंग सान सूकी सत्ता में आई थीं,तो यहां के लोगों के बीच कम-से-कम कुछ उम्मीद थी कि रोहिंग्या मामले में कुछ सुधार होगा। दरअसल, पहले उनकी वहां की पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा दबाव डाला जा चुका है। इस उद्देश्य के लिए पूर्व संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन भी किया गया था। पिछले कुछ महीनों से मैं बस आशान्वित होकर लिख रहा था और गौर कर रहा था कि चीजें सही दिशा बढ़ रही हैं या नहीं। पर अचानक से महसूस किया कि हालात बहुत तेजी से बदल रहे हैं। हम गहरी खाई की तरफ बढ़ चले है, जिसमें गिरने के लिए बस एक धक्का मारने की जरूरत है।

हमारे पास खोने के लिए समय नहीं है! हम उन्हें तड़पता हुआ नहीं छोड़ सकते हैं। इसके पहले की यह रवाडा बन जाए हमारी सरकारों को मयंमार की संघीय सरकार पर मामले पर हस्तक्षेप और पुर्नवास के लिए दबाव बनाना चाहिए। अब हमें हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ सीधे संपर्क करना चाहिए। उन्हें स्थिति के बारे में पता करने और कार्रवाई के लिए मयंमार की सरकार पर दबाव बनवाना चाहिए, तब जाकर आंग सान सू की भी हरकत में आएंगी, अगर वो इसको नहीं करती हैं या इसके लिए तैयार नहीं होती हैं, तो उसके बाद संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों को उतार देना चाहिए। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो इसका सामाधान नहीं निकलेगा। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उनके लिए क्या करते हैं।

 

डॉ. अज़ीम इब्राहिम ‘सेंटर फॉर ग्लोबल पॉलिसी’ के सीनियर फेलो हैं और ‘The Rohingyas: Inside Myanmar’s Hidden Genocide के लेखक हैं।

साभार: The huffington post

TOPPOPULARRECENT