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लडडू के बदले ईमान का सौदा…?

हैदराबाद 06 सितंबर: अंधविश्वास वो खतरनाक बीमारी है, जो न केवल इज़्ज़त, दौलत को तबाह-ओ-बर्बाद कर देती है बल्कि इन्सान को ईमान जैसी दौलत से भी महरूम कर देती है।

वो इन्सान इंतेहाई बदक़िस्मत है जो नफ़ा और फ़ायदे के लिए ग़ैर अल्लाह से उम्मीद लगाए बैठते हैं।
खासकर हमारे देश में, अंधविश्वास ने एक वबाई शक्ल इख़तियार करली है और इस की गंदगी में समाज का हर तबका शामिल हो रहा है।

बात इस हद तक पहूंच गई है कि अब तो खाने पीने की चीज़ को भी ख़ुशक़िसमती और बदकिस्मती की वजह समझा जा रहा है।अगर कोई ग़ैर मुस्लिम इस किस्म की हरकत करता है तो यह समझ में आने वाली बात है। लेकिन कोई मुस्लमान मंदिर या गणेश मंडपों के चक्कर ये सोच कर लगाता है कि इस का नसीब जाग जाएगा तो बड़ी हैरत होती है।

हर साल गणेश विसर्जन के मौक़े पर दोनों शहरों के मुख़्तलिफ़ गणेश मंडपों पर लडडू का हराज किया जाता है इन लडडू के बारे में कहा जाता है कि जो उन्हें हराज में बोली लगा कर हासिल करता है वो बड़ा ख़ुश-क़िस्मत होता है।

लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि एक अल्लाह की इबादत का दावा करने वाले दो मुस्लमानों ने हराज में हिस्सा लेते हुए लडडू अपने नाम किया है। बंडलगुड़ा में शिवजी युथ एसोसिएशन के हराज में इसी गांव के इर्फ़ान नामी मुस्लिम नौजवान ने एक लाख 87 हज़ार की बोली लगाते हुए लडडू अपने नाम कर लिया है। एक और वाक़िया रामनतापूर में पेश आया जहां महबूब वली ने 70,116 की बोली लगाते हुए लडडू छुड़ा लिया है। जो मुस्लमानों के लिए फ़िक्र की बात है।

सेकुलरिज्म और मज़हबी अक़ीदा दो अलग चीज़ें हैं लेकिन ख़ुद को सेक्युलर ज़ाहिर करने के लिए ईमान का सौदा करना गुमराही के सिवाए कुछ भी नहीं है।

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