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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल: “किस क़दर आइना अकेला था”

अपने अंदाज़ का अकेला था
इसलिए मैं बड़ा अकेला था

प्यार तो जन्म का अकेला था
क्या मेरा तजरिबा अकेला था

साथ तेरा ना कुछ बदल पाया
मेरा ही रास्ता अकेला था

जो भी मिलता गले लगा लेता
किस क़दर आइना अकेला था

(वसीम बरेलवी)

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