Wednesday , June 20 2018

विक़ार एनकाउंटर मज़हबी‍ ओ‍ सियासी ताक़तें मुकम्मिल नाकाम

शहरयाने हैदराबाद इन क़ाइदीन मिल्लते इस्लामीया की शिद्दत से कमी महसूस करने लगे हैं जिन्होंने इस शहरे हैदराबाद में बसने वाले मुसलमानों के हौसलों को ज़िंदा रखने के लिए हुकूमत से उलझने में भी कोई ख़तरा महसूस नहीं किया और बाज़ मर्तबा तो

शहरयाने हैदराबाद इन क़ाइदीन मिल्लते इस्लामीया की शिद्दत से कमी महसूस करने लगे हैं जिन्होंने इस शहरे हैदराबाद में बसने वाले मुसलमानों के हौसलों को ज़िंदा रखने के लिए हुकूमत से उलझने में भी कोई ख़तरा महसूस नहीं किया और बाज़ मर्तबा तो अपनी ताईदी हुकूमत के ख़िलाफ़ मसाजिद के मिंबर को प्लेटफार्म बनाते हुए वार्निंग देने से भी पीछे नहीं रहे।

मौलाना हमीदुद्दीन आक़िल हुसामी, मौलाना सुलेमान सिकन्दर और उनकी तरह दुसरे शख़्सियात ने मिल्लते इस्लामीया के नौजवानों पर होने वाले मज़ालिम पर कभी ख़ामोशी इख़तियार नहीं की बल्कि हक़ से तमाम सूरतों को कुचलने के लिए तैयार रहे।

7 अप्रैल को आलेर में हुए 5 नौजवानों के एनकाउंटर के मुआमले में ना सिर्फ़ मुस्लिम सियासी क़ियादत नाकाम होचुकी है बल्कि मज़हबी क़ियादत भी इन मुआमलात से निमटने में नाकाम नज़र आरही है।

सियासी क़ियादत की एनकाउंटर मुआममे में किसी भी तरह की सख़्त बयानी या उम्मत को झंझोड़ने की कोशिश ना की जाना इस बात की दलील हैके सियासी क़ियादत इस मुआमले में सख़्त एहतेजाज के मूड में नहीं है जबकि 5 नौजवानों का सफ़ाकाना क़त्ल किसी मंदिर की सजावट से ज़्यादा तकलीफ़देह है।

मज़हबी क़ियादत जोकि हमेशा हैं सियासी वाबस्तगी से बालातर एहतेजाज क्या करती थीं लेकिन इन 5 मुस्लिम नौजवानों के एनकाउंटरस के मुआमले में मज़हबी क़ियादत की नाकामी क़ाबिल फ़िक्र बन चुकी है। रियासत तेलंगाना में मुस्लिम क़ियादत मज़हबी क़ियादत का विक़ार आलेर में हुए विक़ार और इस के साथीयों के एनकाउंटर के बाद कमज़ोर होता जा रहा है और मज़हबी क़ियादत के ज़िम्मेदार इस बात को महसूस कररहे हैं लेकिन उनकी सियासी मजबूरियां उन्हें लाचार करती जा रही हैं।

अगर यही सूरते हाल रही तो अवाम में मज़हबी क़ियादत अपने विक़र् खो देगी। यक़ीनन मुशतर्का मजलिस-ए-अमल के जलसे में मुस्लिम मज़हबी क़ाइदीन बज़ाहिर मुत्तहिद नज़र आए लेकिन जो सूरते हाल पैदा होरही इस से निमटने के लिए संजीदा फ़िक्र के हामिल मज़हबी रहनुमा फिकरमंडद हैं।

मौलाना मुहम्मद हमीदुद्दीन हुसामी आक़िल ने एसे वक़्त भी हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई जब ख़ुद उनके दामाद रहीमुद्दीन अंसारी हुकूमत का हिस्सा बने हुए थे। मौलाना आक़िल ने अपनी ज़िंदगी में वक़्त आने पर हुकूमत के ख़िलाफ़ बोलने के मुआमले में मस्लिहत से काम नहीं लिया बल्कि जब कभी ज़रूरत पेश आई उन्हों ने मस्जिद के मिंबर को ही सही अपना प्लेटफार्म बनाते हुए हुकूमत को वार्निंग दिया इसी तरह मौलाना सुलेमान सिकन्दर ने भी अपनी ज़िंदगी में मुफ़ाहमत नहीं की बल्कि सरकारी मुआमलात के ख़िलाफ़ जद्द-ओ-जहद के लिए हज़रत ख़लील-उल-ल्लाह हुसैनी के मिशन पर चले रहे और कुल हिंद मजलिस तामीरे मिल्लत की तरफ से मज़लूमों की हिमायत में हमेशा उठ खड़े होने वाले सफ़ अव्वल के क़ाइदीन में इन का शुमार होता था।

सियासी क़ियादत की मजबूरियां तो पता नहीं लेकिन मज़हबी क़ाइदीन जो कि ख़ुलूस दिल से इस मुआमले में जद्द-ओ-जहद के हामिल हैं, मुशतर्का मजलिस-ए-अमल के तरीके कार को तन्क़ीद का निशाना बनाते हुए सवाल कररहे हैं कि 5 मुस्लिम नौजवानों की ज़िंदगीयां अहम हैं या किसी मंदिर की सजावट का मुआमला अहम था?

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