शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेह्दी हस‌न नहीं रहे

शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेह्दी हस‌न नहीं रहे
कराची / दिल नादान तुझे हुआ क्या है, पत्ता पत्ता बोटा बोटा, गुलों में रंग भरे, आए कुछ अब‌र कुछ शराब आए जैसी मशहुर ग़ज़लों को अपनी मस्हूर कुन आवाज़ से सदाबहार बनाने वाले शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेह्दी हुस‌न का आज़ा-ए-रईसा के नाकारा होजाने के सबब आज इ

कराची / दिल नादान तुझे हुआ क्या है, पत्ता पत्ता बोटा बोटा, गुलों में रंग भरे, आए कुछ अब‌र कुछ शराब आए जैसी मशहुर ग़ज़लों को अपनी मस्हूर कुन आवाज़ से सदाबहार बनाने वाले शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेह्दी हुस‌न का आज़ा-ए-रईसा के नाकारा होजाने के सबब आज इंतिक़ाल होगया।

इन की उम्र 84 साल थी। मेह्दी हसन को जिन के बर्र-ए-सग़ीर हिंद-ओ-पाक में लाखों चाहक‌ हैं, कुच्छ‌ दिनों पहले कराची के आग़ा ख़ान हॉस्पिटल में दाखिल‌ किया गया था जहां उन की हालत तशवीशनाक होजाने के बाद उन्हें मस्नूई तनफ़्फ़ुस पर रखा गया था। मेह्दी हसन के बेटे आरिफ़ हसन ने कहाकि मेरे पिता एक लम्बी मुद्दत‌ तक मुख़्तलिफ़ बिमारियों से लड़ते हुए आज दोपहर 12 बजकर 22 मिनट पर इंतिक़ाल कर गए।

मेह्दी हसन के इंतिक़ाल की खबर फेलते ही उन के हज़ारों चाहक‌ आग़ा ख़ान हॉस्पिटल पर जमा होगए। मेह्दी हसन 18 जुलाई 1927 को हिंदूस्तानी रियासत राजिस्थान के गांव लूना में रिवायती मूसीक़ारों के कलावंत घराने में पैदा हुए थे। 1947 में आज़ादी-ओ-तक़सीम के बाद इन का ख़ानदान पाकिस्तान चला गया था। जब उन की उम्र सिर्फ 20 साल थी।

मेह्दी हसन कलावंत घराने के मूसीक़ारों की 16 वीं नसल से ताल्लुक़ रखते थे। उन्हों ने अपने पिता उस्ताद अज़ीम ख़ां और चचा उस्ताद इस्माईल ख़ां से तर्बीयत ली जो रिवायती ध्रुव पद के गुलूकार थे।इस के बाद छोटी उमर से ही उन्हों ने अपने बिरादर कलां के साथ ध्रुव पद और ख़्याल में गुलूकारी का आग़ाज़ कर दिया था।

उस ज़माने में अगरचे इन का ख़ानदान ग़रीबी का शिकार था लेकिन उन्हों ने मूसीक़ी से अपनी मुहब्बत को छोडा नहीं । रोज़मर्रा की परेशानीयों के बावजूद मेह्दी हसन साबित क़दमी से यौमिया रियाज़ जारी रखा। उन्हों ने ज़िंदगी की गुज़र बसर के लिए साईक़ल की दूकान पर काम भी किया। लेकिन 1957 से उन के हालात बदलते गए जब उन्हें रेडीयो पाकिस्तान पर पहली मर्तबा ग़ज़ल गायकी का मौक़ा मिल गया।

मेह्दी हसन ग़ज़ल के माया नाज़ उसताजों में अपना मुक़ाम बनाया, ग़ालिब और मीर के इलावा उन्हों ने इस दौर के शायर फ़ैज़ और फ़राज़ की कई ग़ज़लों को अपनी सह‌र अंगेज़ आवाज़ देते हुए सदाबहार बना दिया। जिन में दिल नादान तुझे हुआ किया है, रंजिश ही सही, गुलों में रंग भरे बाद नौ बहार चले वग़ैरा काबिल ‍ए‍ ज़िक्र हैं। इन की मौत से ना सिर्फ ग़ज़ल बल्कि शायरी और रिवायती मूसीक़ी का एक अज़ीम बाब ख़त्म‌ होगया है।

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