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शहरयार को ख़िराज-ए-अक़ीदत

नामवर उर्दू शायर शहरयार के इंतिक़ाल के बाद उन के दोस्तों, अज़ीज़ों और परसितारों की जानिब से ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किए जाने का सिलसिला जारी है। शहरयार का असली नाम अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान था, जिन का पीर के रोज़ इंतिक़ाल हो गया था। इस मौक़ा पर हिन

नामवर उर्दू शायर शहरयार के इंतिक़ाल के बाद उन के दोस्तों, अज़ीज़ों और परसितारों की जानिब से ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किए जाने का सिलसिला जारी है। शहरयार का असली नाम अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान था, जिन का पीर के रोज़ इंतिक़ाल हो गया था। इस मौक़ा पर हिन्दी के मशहूर शायर गोपाल दास नीरज ने उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा कि शहरयार की शायरी के ना सिर्फ उर्दू अदब बल्कि हिन्दी अदब पर भी मुसबत असरात मुरत्तिब हुए।

इसी तरह प्रोफेसर अब्बू उल-कलाम क़ासिमी, विजय कुमार बजाज ने भी मरहूम शायर को ज़बरदस्त ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश किया। मंज़ूर अली की फ़िल्म गमन ने शहरयार को रातों रात स्टार बना दिया था। 19 जून 1934 को ज़िला बरेली के मुस्तक़र आंवला में शहरयार की पैदाइश हुई। मुख़्तलिफ़ मराहिल तए करते हुए वो 1996-ए-में अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के डिपार्टमैंट आफ़ उर्दू के सदर नशीन भी मुक़र्रर हुए थे।

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