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शहर में गै़रक़ानूनी-ओ-ग़ैर मजाज़ मंदिरों की तामीर ज़ोरों पर

हैदराबाद -20 नवंबर । शहर के अक्सर-ओ-बेशतर फुटपाथों, चौराहों , गंदे नालों, मूसा नदी के अंदरूनी हिस्सों और किनारों के इलावा तारीख़ी मुक़ामात के क़रीब सरकारी दफ़ातिर, सरकारी हॉस्पिटल्स ग़रज़ हर मुक़ाम पर गै़रक़ानूनी तौर पर मंदिरों की

हैदराबाद -20 नवंबर । शहर के अक्सर-ओ-बेशतर फुटपाथों, चौराहों , गंदे नालों, मूसा नदी के अंदरूनी हिस्सों और किनारों के इलावा तारीख़ी मुक़ामात के क़रीब सरकारी दफ़ातिर, सरकारी हॉस्पिटल्स ग़रज़ हर मुक़ाम पर गै़रक़ानूनी तौर पर मंदिरों की तामीरात का सिलसिला जारी ही। यहां तक कि तालीमी इदारों में भी शरपसंद अनासिर देखते ही देखते गै़रक़ानूनी तौर पर मज़हबी ढाँचे खड़े कर रहे हैं और हैरत-ओ-ताज्जुब की बात ये हीका ये सब कुछ हुक्काम पुलिस के सामने होरहा है जबकि हुकूमत इन गै़रक़ानूनी मज़हबी ढाँचों के ताल्लुक़ से चशमपोशी इख़तियार किए हुए हैं।

क़िला गोलकुंडा, सात गनबद अन्न और दीगर तारीख़ी मुक़ामात के अंदरूनी हिस्सों में यहां तक कि क़ुतुब शाही क़ब्रिस्तान में भी मंदिर तामीर करदिए गई। अफ़सोस आरक्योलोजीकल सर्वे आफ़ इंडिया (महिकमा आसारे-ए-क़दीमा) के मुजरिमाना ख़ामोशी बरतने वाले ओहदेदारों की नज़रों के सामने ये सब कुछ किया गया ही, लेकिन इन बे हिस्सों और अमन के दुश्मनों में इतनी दियानत-ओ-जुर्रत नहीं कि वो शरपसंदों को ग़ैर मजाज़-ओ-गै़रक़ानूनी तामीरात से बाज़ रखी। आज राक़िम उल-हरूफ़ ने शहर के मुख़्तलिफ़ मुक़ामात का दौरा किया और देखा कि कई मुक़ामात पर ग़ैर मजाज़ मंदिरों की तामीर जारी हैं। पुलिस और सरकारी ओहदेदार सब देख कर भी ख़ामोश हैं।

क़ारईन को बतादें कि मूसा नदी में 33 मुक़ामात पर मज़हबी ढांचा खड़े करदिए गए हालाँकि सारे शहर की गंदगी मोरियों के ज़रीया इस नदी में बेहती ही। आप को हैरत होगी कि हैदराबाद ज़ौ बहादुर पूरा में जहां बे ज़बां जानवरों, हमा इक़साम के चरिंद-ओ-परिंद और हशरात को रखा गया ही। अमन-ओ-सुकून और इत्तिहाद-ओ-इत्तिफ़ाक़, प्यार-ओ-मुहब्बत के दुश्मन फ़िकरोपरस्त भेड़ीए नुमा इंसानों ने 18 मुक़ामात पर छोटे पत्थर रख कर वहां पुख़्ता मज़हबी ढांचा तामीर करने की तैय्यारी कर ली हैं।

हो सकता हीका एक साल दो साल 5 साल या 10 साल में ज़ौक़े 18 मुक़ामात पर आप को मुनादिर नज़र आएं । इस के लिए मुताल्लिक़ा ओहदेदार ज़िम्मेदार हैं। आप ने शहर में देखा होगा कि जहां कुछ अर्सा क़बल मुख़्तलिफ़ रंग किए पत्थर होते थे अब वहां पुख़्ता मंदिरें हैं। विक्टरी प्ले ग्राउंड चादर घाट के क़रीब मूसा नदी के किनारे एक क़दीम दरगाह हज़रत सआदत बनी हाशिम ऒ वाक़्य है लेकिन शरपसंदों ने क़रीब में पत्थर लगाए फिर अचानक मूर्तियां बिठा दी गईं और आज कई पुख़्ता मंदिर वहां आप को नज़र आयेंगी ।

क्या पुलिस की नज़रों में ये मंदिर नहीं आएं? क्या बलदिया की लापरवाही और बदउनवानी के लिए ओहदेदारों की आँखों से ये ओझल रहें? सब कुछ होता रहा लेकिन पुलिस और सरकारी ओहदेदार तमाशाई बने रही। कल ही प्रोफ़ैसर वीशवीशोर राॶ ने कहा कि एक मंसूबा के तहत मंदिर तामीर किए जा रहे हैं। उन्हों ने उस्मानिया यूनीवर्सिटी में अचानक नमूदार होने वाली मुनादिर और निज़ाम कॉलिज के चौकीदार के कमरा को मंदिर में तबदील करने की मिसालें पेश करके अमन फ़र्ज़ से ग़ाफ़िल ओहदेदारों के चेहरों पर ज़ोरदार तमाँचे रसीद किए हैं। क़ारईन ! आज हम ने शेख़ पेन का दौरा किया जहां कई मुक़ामात पर नाजायज़-ओ-गै़रक़ानूनी मंदिरें तामीर करने की कोशिश जारी है ।

पुलिस की ख़ामोशी से ये अनासिर कामयाब होरहे हैं । शेख़ पेट चौराहा पर एक महीना पहले आलमी माहौलियाती तनव्वो कान्फ़्रैंस के ज़िमन में रोड डीवाईडर पर एक प्लेटफार्म बनाया गया था। इस प्लेटफार्म पर अश्रार ने मज़ीद कुछ पत्थर रखते हुए उस को भगवा रंग दिया और ज़ाफ़रानी झंडे नसब करदिए । इस तबदीली से बेचैन मुक़ामी अफ़राद ने पुलिस को उस की इत्तिला दी लेकिन हैरत की बात ये रही कि पुलिस पिकिट रहने के बावजूद वहां एक बड़ा चबूतरा तामीर करके इस पर एक बड़ा ज़ाफ़रानी झंडा नसब कर दिया और चबूतरा पर मुख़्तलिफ़ भगवानों की तसावीर लगादी और ये सब कुछ पुलिस की निगरानी में किया गया। आज आप ख़ुद देख सकते हैं कि कोई ऐसा सरकारी दफ़्तर नहीं जहां कोई मंदिर नहीं हो। क़िला गोलकुंडा में कई दीवारों और दरख़्तों के नीचे मुख़्तलिफ़ पत्थर को अजीब-ओ-ग़रीब रंगते हुए वहां मंदिरें बनाने की कोशिश की जा रही हैं।

सात गनबदों के क़ुतुब शाही क़ब्रिस्तान में मंदिर बनादी गई, लेकिन क़िला गोलकुंडा और सात गनबद इन का निगरान महिकमा आरक्योलोजीकल सर्वे के ओहदेदारों को कुछ भी नज़र नहीं आता। हाँ माहाना पाबंदी से बड़ी तनख़्वाहें लेना ओहदेदार नहीं भूलती। ऐसा लगता हीका तास्सुब के बाइस ये ओहदेदार अंजान बनते हैं हालाँकि वो और उन का ज़मीर अच्छी तरह जानता हीका आज जिन मुक़ामात पर चंद पत्थर लगाकर मंदिर बनाने की तैय्यारीयां की जा रही हैं वहां कभी मंदिर मौजूद नहीं थी। एक हिंदू बुज़ुर्ग ने इस रुजहान पर अफ़सोस का इज़हार करते हुए दिलचस्प तबसरा किया कि शरपसंद भगवानों के नाम पर ग़लाज़त से पर नदी नालों, फुटपाथों पर मंदिरें बनाने में मसरूफ़ हैं।

अगर उन्हें मुनादिर बनाने का अनिता ही शौक़ हो तो अच्छे मुक़ाम पर अराज़ी ख़रीद कर मंदिर बनाईं उन्हें कोई भी नहीं रोकेगा। तारीख़ी सालार जंग म्यूज़ीयम की गेट के बिलकुल बाज़ू फुटपाथ पर एक छोटी सी मंदिर को बड़ा करने की कोशिश के तौर पर लक्कड़ी का फ्रे़म डाला गया। पुलिस म्यूज़ीयम के सीकोरीटी ओहदेदार और म्यूज़ीयम हुक्काम के इलम में भी ये बात है लेकिन सब ख़ामोश हैं। उन की ख़ामोशी के बारे में वो ख़ुद बेहतर जवाब दे सकते हैं। फ़िकऱ्ापरस्त और शरपसंद मंदिरों और मज़हबी मुक़ामात की नाजायज़ तामीर के लिए ऑटो और टैक्सी असटानडस को तक नहीं बख़शती। पहले छोटा पत्थर फिर बड़ा पत्थर और देखते ही देखते मंदिर ये उन की चाल होती हैं।

क़ारईन ! शेख़ पेट चौराहा की एक माह क़बल और अब ली गई दोनों तसावीर आप देख सकते हैं। एक माह में वहां कितनी तबदीलीयां आएं। इस से अंदाज़ा करपाऐंगे और सब कुछ पुलिस की नाक के नीचे हुआ और लगता है कि वहां बहुत जल्द एक मंदिर तामीर हो जाएगा।

गोलकुंडा में 5 तारीख़ी मसाजिद हैं महिकमा आसारे-ए-क़दीमा के फ़िकरोपरस्त-ओ-मुतअस्सिब ओहदेदार मुस्लमानों को नमाज़ की इजाज़त नहीं देते लेकिन जगह जगह जो मंदिरें मंज़र-ए-आम पर आरही हैं इस पर कोई एतराज़ नहीं। चारमीनार से मुत्तसिल गै़रक़ानूनी ढांचा का जो मसला पैदा हुआ वो भी आसारे-ए-क़दीमा के ओहदेदारों की बददियानती, फ़िर्कापरस्ती और तास्सुब का नतीजा हैं। शहर के मौजूदा हालात में कमिशनर पुलिस और ख़ुद हुकूमत को चाहिए कि रातों रात गै़रक़ानूनी तौर पर वजूद में आने वाली मंदिरों को फ़ौरी तौर पर हटाए क्योंकि ये ढांचा इंसानों को ढाँचों में तबदील करने का बाइस बिन सकते हैं।

जहां तक तारीख़ी मुक़ामात पर ग़ैर मजाज़ मंदिरों की तामीर का सवाल है फ़ौरी वहां ओहदेदारों को बरतरफ़ करदेना चाहीए ताकि दूसरे ओहदेदारों को अपनी ज़िम्मेदारीयों का एहसास हो सकी।

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