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शाही मस्जिद बाग़-ए-आम्मा के अहाता की दीवार से मुत्तसिल कमरा को मंदिर बनाने का मंसूबा

शाही मस्जिद बाग़-ए-आम्मा का शुमार शहर की ख़ूबसूरत तरीन मसाजिद में होता है। असेंबली से मुत्तसिल इस मस्जिद में हर नमाज़ के मौक़ा पर मुस्लियों की कसीर तादाद देखी जाती है और जुमा के मौक़ा पर तो दूर दराज़ के मुस्लमान भी यहां नमाज़ की अद

शाही मस्जिद बाग़-ए-आम्मा का शुमार शहर की ख़ूबसूरत तरीन मसाजिद में होता है। असेंबली से मुत्तसिल इस मस्जिद में हर नमाज़ के मौक़ा पर मुस्लियों की कसीर तादाद देखी जाती है और जुमा के मौक़ा पर तो दूर दराज़ के मुस्लमान भी यहां नमाज़ की अदायगी के लिए पहूँचते हैं। बाग़-ए-आम्मा (पब्लिक गार्डन) आने वाले मुल्क-ओ-बैरून-ए-मुल्क के मेहमानों की नज़रें ज़रूर इस ख़ूबसूरत मस्जिद पर पड़ती है।

एक तरह से ये मस्जिद सय्याहों को हैदराबाद दक्कन में मुसलमानों की अज़मत रफ़्ता और उन के ग़ैरमामूली माज़ी की याद दिलाती है। 1846 में तामीर किए गए बाग़-ए-आम्मा में मौजूद ये मस्जिद दुनिया को इस बात का भी पयाम देती है कि मुस्लिम हुक्मराँ ख़ुशगवार-ओ-सेहत मंद माहौल के लिए शहर को सरसब्ज़-ओ-शादाब रखने को अव्वलीन तर्जीह दिया करते थे लेकिन आज बाग़-ए-आम्मा की इस तारीख़ी मस्जिद का कोई पुर्साने हाल नज़र नहीं आता।

ये मस्जिद 13811 गज़ रकबा पर फैली हुई थी लेकिन फ़िर्क़ा परस्तों ने 3362 मुरब्बा गज़ जमीन को ऐसा हज़म किया कि अब इस का पता ही नहीं चलता। हद तो ये है कि इस मस्जिद की जो बाउंडरी वाल है उस को लगाकर बाग़-ए-आम्मा के मालियों ने एक कमरा तामीर करवाया।

पहले पहल इस में माली और दीगर मुलाज़िम कपड़े बदला करते थे और खाना खाने के लिए इस कमरे का इस्तिमाल किया जाता था लेकिन अफ़सोस और ग़म के साथ कहना पड़ता है कि इस कमरे में एक मंसूबा बंद साज़िश के तहत मुख़्तलिफ़ हिंदू भगवानों की कसीर तसावीर रख दी गई हैं।

आप को बतादें कि 1846 में जब तारीख़ी पब्लिक गार्डन या बाग़-ए-आम्मा तामीर किया गया था उस वक़्त वहां किसी मंदिर का नाम-ओ-निशान तक मौजूद नहीं था। इस के बरख़िलाफ़ शाही मस्जिद का इंतिहाई ख़ूबसूरत चांदी का मॉडल हुज़ूर निज़ाम को पेश किया गया था जो आज भी पुरानी हवेली के निज़ाम म्यूज़ीयम में मौजूद है।

बहरहाल हमारी इस रिपोर्ट का मक़सद हुकूमत और महिकमा अक़लीयती बहबूद के साथ साथ महिकमा पुलिस और क़ानून के मुहाफ़िज़ दीगर इदारों को ये याद दिलाना है कि बाग़ आम्मा, जुबली हाल और तारीख़ी शाही मस्जिद हैदराबाद की शान-ओ-शौकत में इज़ाफ़ा का बाइस बनने वाले तामीर शाहकार हैं।

ऐसे में उन्हें चाहीए कि उन मुक़ामात पर शरपसंदों को किसी भी किस्म की शरपसंदी से रोका जाये और मस्जिद के अहाता की दीवार से लगाकर जो कमरा तामीर किया गया , उसे फ़ौरी मुनहदिम करदे वर्ना एक दिन ये कमरा शहर के अमन-ओ-अमान को मुनहदिम करने का बाइस बन सकता है।

रियास्ती वज़ीर-ए-अक़लीयती बहबूद जनाब अहमद उल्लाह को भी चाहीए कि वो हाथ पर हाथ धरे और अपने चंद चापलोसों के झुरमुट में ना बैठें बल्कि फ़ौरी हरकत में आने की जुरआत करें ताकि मस्जिद की 3362 गज़ जमीन को हासिल किया जा सके और इस के इलावा मौक़ूफ़ा जमीनात-ओ-ग़ैर आबाद मसाजिद की ज़मीनों पर जो नाजायज़ मंदिरें तामीर करने का बद बख्ता ना सिलसिला शुरू हुआ है इसे ख़त्म किया जा सके।

हुकूमत और पुलिस को इस बात पर संजीदगी से ग़ौर करना चाहीए कि आख़िर शरपसंद तारीख़ी मुक़ामात और आसार के क़रीब ही नाजायज़-ओ-गै़रक़ानूनी तौर पर मंदिरें और मज़हबी ढाँचे क्यों तामीर कररहे हैं? और उन तामीरात का मक़सद किया है?

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