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शेख मुनीरा सहाफ़ी बनना चाहती थीं

मुंबई में 26/11 के दहशतगर्द हमलों के पाँच साल पूरे हुए, इस हमले में कई ख़ानदानों की ज़िंदगियां तबाह हो गई। इन में से एक ख़ानदान शेख पीर पाशा का भी है जो 26 नवंबर 2008 को दहशतगर्द हमलों में गोली का शिकार हो गए थे । शेख पीर पाशा मुक़ामी होटल लियो बो

मुंबई में 26/11 के दहशतगर्द हमलों के पाँच साल पूरे हुए, इस हमले में कई ख़ानदानों की ज़िंदगियां तबाह हो गई। इन में से एक ख़ानदान शेख पीर पाशा का भी है जो 26 नवंबर 2008 को दहशतगर्द हमलों में गोली का शिकार हो गए थे । शेख पीर पाशा मुक़ामी होटल लियो बोल्ड कैफे में मुलाज़िम थे।

डिनर के दौरान हमलावरों ने फायरिंग की जिस में कई लोग मारे गए । इन में पीर पाशा भी शामिल थे । उनका ख़ानदान पाँच साल बाद भी हालात की सितम ज़रीफ़ी का शिकार होकर ज़िंदा है। पीर पाशा की 17 साला दुख़्तर शेख़ मुनीरा, पाँच भाईयों , बहनों में सब से बड़ी है ।

इनका सहाफ़ी बनने का ख़ाब था लेकिन ये ख़ाब चकनाचूर हो गया । शेख मुनीरा ने कहा कि बाबा की मौत के बाद हमारा घर बिखर गया लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी। हम चाहते हैं कि वालिद की आरज़ू को पूरा करने के लिए तमाम बच्चे तालीम हासिल करें लेकिन ये मुम्किन दिखाई नहीं देता , गुज़ारा ही मुश्किल है।

ताहम वो और उनकी वालिदा ने तए कर लिया है कि बच्चों को पढ़ाएंगे। शेख मुनीरा ने मज़ीद कहा कि वो अपने भाईयों और बहनों को पढ़ाने के लिए अपनी तालीम का ख्वाब क़ुर्बान कर देंगी। उन्हें होटल की जानिब से माहाना पाँच हज़ार रुपये वज़ीफ़ा मिल रहा है। माबक़ी अख़राजात वालिदा और मैं मेहनत कर के पूरे कर लेते हैं।

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