Wednesday , December 13 2017

शोर: डिप्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर और बहरेपन की वजह

नई दिल्ली, 26 मार्च: आज का दौर नफसा नफ़सी और भागम भाग का दौर है। हर तीसरा शख़्स डिप्रेशन, टेंशन, हाई ब्लडप्रेशर, बहरेपन और चिड़चिड़ापन जैसी बिमारियों में मुबतला हैं। ईलाज के लिए डाक्टरों के य‌हाँ उन अमराज़ में मुबतला अफ़राद की एक बड़ी ता

नई दिल्ली, 26 मार्च: आज का दौर नफसा नफ़सी और भागम भाग का दौर है। हर तीसरा शख़्स डिप्रेशन, टेंशन, हाई ब्लडप्रेशर, बहरेपन और चिड़चिड़ापन जैसी बिमारियों में मुबतला हैं। ईलाज के लिए डाक्टरों के य‌हाँ उन अमराज़ में मुबतला अफ़राद की एक बड़ी तादाद मौजूद होती है। इन बिमारियों की एक बड़ी वजह बढ़ती हुई सुस्ती आलूदगी भी है। शोर हमारी ज़हनी और जिस्मानी सेहत के लिए सल्लू पुयाईज़निंग की सी मनफ़ी ख़ुसूसियात का हामिल है।

अब हम अपने इर्दगिर्द के माहौल पर नज़र दौड़ायं तो हमें एहसास होगा कि हमारे अवाम की ज़हनी और जिस्मानी सेहत किस किस अंदाज़ में शोर के इस ज़हर से मुतास्सिर होरही है। ट्रेफ़िक का शोर, फ़ैक्ट्रियों और मशीनों का शोर, हवाई अड्डे के नज़दीक जहाज़ों का शोर, रिहायशी इलाक़ों में बने पेट्रोल पंपों का शोर, रेलवे स्टेशन के नज़दीकी इलाक़ों में रेल गाड़ियों की दिल दहला देने वाली छक छक और इस तरह के दीगर अवामिल की ज़हनी-ओ-जिस्मानी सेहत के ज़्यां और बिगाड़ का बाइस बन रहे हैं और बेचारी अवाम ना चाहते हुए भी इस ज़हर को फांकने पर मजबूर हैं,बल्कि इस सल्लू पुयाईज़निंग के मुताल्लिक़ आगही ना होने के बाइस अवाम की एक ग़ालिब तादाद तो इस हक़ीक़त से ही नाबलद है कि शोर ज़हनी-ओ-जिस्मानी सेहत के लिए कितना ख़तरनाक है।

ज़ेरे नज़र मज़मून आम-ओ-ख़ास में शोर की आलूदगी और इस आलूदगी के नतीजे में इंसान की ज़हनी-ओ-जिस्मानी सेहत पर मुरत्तिब होने वाले मनफ़ी असरात और हिफ़ाज़ती इक़दामात के मुताल्लिक़ आगाही पैदा करने की एक कोशिश है। शोर के उतार छुट्टी को नापने का पैमाना डेसीबल (ecibel) है। हमारे वतन में शोर की आलूदगी रोज़ बरोज़ बढ़ रही है। बढ़ती हुई ट्रेफ़िक और सनअत ने शोर में मज़ीद कई डेसीबल इज़ाफ़ा कर दिया है और अफ़सोस कि हिफ़ाज़ती उसूलों से ना वाक़फियत की वजह से ये इज़ाफ़ा रोज़ अफ़्ज़ूँ है।

खासतौर पर सुबह दफ़ातिर और स्कूलों के शुरू होने के औक़ात, दोपहर को स्कूलों की छुट्टी और दोपहर के खाने का वक़फ़ा और फिर शाम के वक़्त दफ़ातिर के ख़त्म होने के औक़ात पर तो इतना शोर और रश् होता है कि कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती।

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