सऊदी अरब: शाही परिवार और सरकार के खिलाफ़ उठने लगी है आवाज़!

सऊदी अरब: शाही परिवार और सरकार के खिलाफ़ उठने लगी है आवाज़!

सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ में स्थित अमरीका के दूतावास और जिद्दा तथा ज़हरान शहरों में स्थित अमरीकी काउंसलेटों ने अपने औपचारिक ट्वीटर एकाउंट पर अरबी और अंग्रेज़ी भाषा में एक ट्वीट कर दिया जिससे सऊदी अरब में हड़कंप मच गया और इसे सऊदी अरब की सरकार के ख़िलाफ़ जनता को उत्तेजित करने की कोशिश का नाम दिया गया। इसे सऊदी अरब के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप क़रार दिया गया।

जिस ट्वीट पर हंगामा मचा है उसमें एक वीडियो है जिसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की बात की गई है। ट्वीट में लिखा गया है कि हालिया बहसों से साबित होता है कि हिंसा रहित शांतिपूर्ण प्रदर्शन का असर हिंसक प्रदर्शनों से अधिक होता है और सऊदी अरब के नागरिकों को चाहिए कि इस वीडियो को देखें।

यह ट्वीट और यह वीडियो एसे समय सामने आया है जब अमरीका और सऊदी अरब के संबंधों में तनाव बढ़ चुका है इसीलिए इस पर नए आयाम से बहस हो रही है।

इस ट्वीट को संयोग नहीं माना जा सकता है बल्कि यह बहुत सोच समझ कर और योजना के तहत उठाया जाने वाला क़दम है जिसका उद्देश्य सऊदी अरब की सरकार पर दबाव डालने के लिए आम जनता को उत्तेजित करना है। अमरीका इस कोशिश में भी है कि सऊदी अरब ने जिन सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़तार किया है उन्हें तत्काल रिहा करे।

गत अगस्त महीने में रियाज़ में कैनेडा के दूतावास ने अपने देश की विदेश मंत्री क्रिस्टीना फ़्रीलैंड की एक ट्वीट प्रकाशित कर दी थी जिसमें सऊदी अरब के भीतर मानवाधिकारों के खुले उल्लंघन की निंदा की गई थी और यह मांग की गई थी कि सऊदी अरब में बंद सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा किया जाए।

इस पर सऊदी अरब की सरकार आग बगूला हो गई और उसने कैनेडा के राजदूत को रियाज़ वापस आने से रोक दिया जो उस समय कैनेडा गए हुए थे। सऊदी अरब ने ओटावा से अपने राजदूत को वापस बुला लिया, कैनेडा के साथ सारा व्यापारिक सहयोग बंद कर दिया और कैनेडा के विश्वविद्यालों में पढ़ने वाले सऊदी छात्रों से कहा कि वह तत्काल सऊदी अरब वापस आ जाएं ताकि उन्हें किसी अन्य देश के विश्वविद्यालय में भेजा जाए।

कैनेडा पर सऊदी अरब को इतनी तेज़ ग़ुस्सा दो कारणों से आया था।पहला कारण यह था कि कैनेडा की विदेश मंत्री ने अपने ट्वीट में गिरफ़तार कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई पर ज़ोर दिया था और यह ट्वीट तत्काल 12 हज़ार यूज़र्स तक पहुंच गई।

दूसरा कारण यह था कि सऊदी अरब ने कैनेडा के ख़िलाफ़ कठोर कार्यवही करके यह कड़ा संदेश देना चाहा कि कोई भी देश कैनेडा की ग़लती को दोहराने की हिम्मत न करे क्योंकि यह सऊदी अरब की नज़र में रेड लाइन है।

एसा लगता है कि रियाज़ में अमरीकी दूतावास ने सऊदी अरब के इस कठोर संदेश पर ध्यान ही नहीं दिया और उसकी धमकियों को कोई महत्व ही नहीं दिया बल्कि कैनेडा से एक क़दम आगे जाकर अपने ट्वीट में सऊदी नागरिकों को प्रदर्शनों की दावत दे दी। देश में राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक सुधार के लिए आवाज़ उठाने का सुझाव दिया।

सऊदी अरब के नरेश शाल सलमान को अच्छी तरह पता है कि समाज के विभिन्न वर्गों में किस प्रकार का रोष पाया जाता है। इसीलिए उन्होंने नए साल के बजट की घोषणा के अवसर पर महंगाई अनुदान देने की बात कही है।

यह सऊदी अरब के इतिहास का सबसे बड़ा बजट है जो एक ट्रिलियन रियाल से ऊपर पहुंच गया है। इस साल भी 35 अरब डालर का बजट घाटा होगा। सऊदी नागरिकों को प्रति माह 1000 रियाल देने की बात कही गई हैं मगर जिस प्रकार की महंगाई है इसमें 1000 रियाल से कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।

हम अब भी समझ नहीं पा रहे हैं कि रियाज़ में अमरीकी दूतावास ने यह क़दम क्यों उठाया? क्योंकि यह मध्यपूर्व के इलाक़े ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में कूटनयिक प्रोटोकोल का खुला उल्लंघन है वह भी इस समय जब हालात बहुत संवेदनशील हैं।

क्या अमरीकी सरकार ने अपने घटक सऊदी अरब और वहां के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान पर सत्ता के ढांच में बदलाव के लिए भरपूर दबाव डालने का इरादा कर लिया है।

वैसे भी अमरीकी सेनेट से एक प्रस्ताव पारित हो चुका है जिसमें सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या के मामले में मुहम्मद बिन सलमान को ज़िम्मेदार ठहराया गया है साथ ही यमन युद्ध में सऊदी अरब के साथ हर प्रकार का सहयोग रोकने की मांग की गई है।

यह भी हो सकता है कि अमरीका सऊदी अरब पर यह दबाव डाल रहा हो कि वह इस्राईल के साथ ख़ुफ़िया रूप से नहीं बल्कि खुले आम दोस्ती करे और यह भी संभव है कि सेनेट के प्रस्ताव पर सऊदी अरब के कठोर स्वर वाले बयान पर अमरीका ने सऊदी अरब को सबक़ सिखाने और उसकी औक़ात बताने का इरादा किया हो।

साभार- ‘parstoday.com’

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