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सज़ाए मौत पर रहनुमा या ना ख़ुतूत की ज़रूरत: जस्टिस मित्तल

जस्टिस गीता मित्तल दिल्ली हाईकोर्ट ने सज़ाए मौत के फ़ैसले सुनाए जाने के दौरान रहनुमा या ना ख़ुतूत की ग़ैरमौजूदगी पर शदीद तशवीश का इज़हार किया।

जस्टिस गीता मित्तल दिल्ली हाईकोर्ट ने सज़ाए मौत के फ़ैसले सुनाए जाने के दौरान रहनुमा या ना ख़ुतूत की ग़ैरमौजूदगी पर शदीद तशवीश का इज़हार किया।

उन्होंने कहा कि ख़ातियों को काल कोठरी तक भेजने के दौरान इस बात की ज़रूरत है कि इस बात को वाज़िह किया जा सके कि सरज़द होने वाला जुर्म शाज़-ओ-नादिर की अंजाम पाता है, जिससे जज्स ( न्याय्धीश) की उलझन दूर हो सकती है।

उन्होंने कहा कि ताहम इसी तरह के कोई रहनुमा या ना ख़ुतूत नहीं है जबकि हर जज के पास इंसाफ़ के मुताल्लिक़ एक अलहदा नफ़सियात होती है और मुक़द्दमा में दी जाने वाली सज़ाए मौत के फ़ैसला पर इसका असर पड़ता है। जस्टिस गीता मित्तल ने जिंदल ग्लोबल ला स्कूल की जानिब से जारी कर्दा किताब की रस्म इजरा के मौक़ा पर इन ख़्यालात का इज़हार किया।

सीनीयर जज ने उनके लेक़्चर अ,एरीका और आलम में सज़ाए मौत का मुस्तक़बिल पर इज़हार-ए-ख़्याल कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हर मुल्क और मुआशरा को चाहीए कि वो सज़ाए मौत के इतलाक़ पर अपने ख़ुद के क़वानीन और पालिसीयां तर्तीब दें जोकि उनके समाजी, तहज़ीबी, अख़लाक़ी और क़ानूनी नज़रियात पर मबनी हो।

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