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सदर जमहूरीया के ज़ेर-ए-ग़ौर दरख़ास्त रहम की तफ्सीलात की पेशकशी के लिए सुप्रीम कोर्ट की हिदायत

सुप्रीम कोर्ट ने आज एक नुमायां एहमीयत का हामिल क़दम उठाते हुए मर्कज़ को हिदायत की है कि वो रहम की 18 दरख़ास्तों से मुताल्लिक़ तफ्सीलात पेश करें। इन दरख़ास्तों में पार्लीमेंट पर हमला के मुजरिम अफ़ज़ल गुरु की दरख़ास्त भी शामिल है जो अपन

सुप्रीम कोर्ट ने आज एक नुमायां एहमीयत का हामिल क़दम उठाते हुए मर्कज़ को हिदायत की है कि वो रहम की 18 दरख़ास्तों से मुताल्लिक़ तफ्सीलात पेश करें। इन दरख़ास्तों में पार्लीमेंट पर हमला के मुजरिम अफ़ज़ल गुरु की दरख़ास्त भी शामिल है जो अपनी सज़ाए मौत के ख़िलाफ़ सदर जमहूरीया को पेश की थी ।

जस्टिस जी एस सिंह भी और जस्टिस एस जे मुखोपाध्याय पर मुश्तमिल एक बंच ने सरकर्दा वकील राम जेठ मिलानी से कहा है कि वो इस बात पर एक तहरीरी दरख़ास्त पेश करें कि आया सदर जमहूरीया इन रहम की दरख़ास्तों पर फ़ैसला के वक़्त अपना ज़हन बा मक़सद अंदाज़ में इस्तेमाल कर सकती हैं ।

अदालत-ए-उज़्मा ने इस एहसास का इज़हार किया कि हुकूमत का रोल ग़ालिबन मुशावर्ती होता है और क़तई फ़ैसला सदर जमहूरीया की सवाबदीद पर मुनहसिर होता है । क़त्ल के एक मुजरिम देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर ने सदर जम्हूरीया की जानिब से उनकी दरख़ास्त रहम पर फ़ैसला में ग़ैर ज़रूरी ताख़ीर को चैलेंज करते हुए अपील दायर की थी जिसकी समाअत के दौरान अदालत ने आज मर्कज़ को ये हिदायात जारी किए हैं ।

सुप्रीम कोर्ट बंच ने एडीशनल सालीसीटर जनरल हरेंद को सज़ाए मौत पाने वाले इन तमाम 18 मुजरिमीन की दरख़ास्त रहम के बारे में तफ़सीलात पेश करने की हिदायत की है जो गुज़शता एक से सात साल के अर्सा से सदर जमहूरीया के पास ज़ेर-ए-ग़ौर हैं । भुल्लर की तरफ़ से रुजू होते हुए सीनीयर वकील के टी एस तुलसी ने अदालत से कहा कि 1997 और 2011 के दरमयान सदर जमहूरीया ने रहम की 32 दरख़ास्तों की यकसूई की जिनके मिनजुमला 13ऐसी दरख़ास्तें हैं जिन पर 10 साल के इंतेज़ार के बाद फ़ैसला किया गया ।

उन्होंने इस्तेदलाल पेश किया कि दीगर 14 दरख़ास्तों की 4 से 10 के ताख़ीर के बाद यकसूई की गई माबाक़ी दरख़ास्तें एक से चार साल की मुद्दत में ग़ौर की गईं। क़ब्लअज़ीं राम जठ मिलानी ने अदालत ने कहा कि सज़ाए मौत पाने वाले किसी मुजरिम की दरख़ास्त रहम पर हती कि एक दिन की ताख़ीर भी नहीं की जानी चाहीए क्योंकि इससे दस्तूर की दफ़ा 21 के तहत अफ़राद को हासिल हक़ आज़ादी की ख़िलाफ़वर्ज़ी होती है। इन्होंने इद्दिआ किया कि हिंदूस्तानी ताज़ीरी क़ानून की दफ़ा 302 ने सज़ाए मौत को आज़म तरीन सज़ा क़रार दिया है लेकिन इस पर तामील या दरख़ास्त रहम पर फ़ैसला में ताख़ीर मुल्ज़िम के लिए एक इज़ाफ़ी सज़ा के मुतरादिफ़ है।

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