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सद्दाम हुसैन को फांसी का खौफ नही था

इराक के साबिक तानाशाह सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने के ऐनी शवाहिद मुवफ्फक अल रुबाई ने बताया कि जिंदगी के आखिरी पलों में भी उनके चेहरे पर पछतावे का कोई एहसास नहीं था। कौमी सलामती के साबिक सलाहकार रुबाई का दफ्तर शुमाली बगदाद के कधि

इराक के साबिक तानाशाह सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने के ऐनी शवाहिद मुवफ्फक अल रुबाई ने बताया कि जिंदगी के आखिरी पलों में भी उनके चेहरे पर पछतावे का कोई एहसास नहीं था। कौमी सलामती के साबिक सलाहकार रुबाई का दफ्तर शुमाली बगदाद के कधिमिया इलाके में है।

रुबाई ने कहा, ‘हां, वह मुजरिम, कातिल, कसाई थे, लेकिन अपने आखिरी वक्त तक भी वह मजबूत बने हुए थे। फांसी के लिए उन्हें ले जाने वालों में मैं भी था। हमारे साथ वहां कोई गैर मुल्की या कोई अमेरिकी नहीं था।’ उन्होंने बताया, वह आम दिनों की तरह दिख रहे थे। उन्होंने सफेद शर्ट और जैकेट पहनी थी। उनके चेहरे पर न कोई डर था और न पछतावा।

रुबाई ने बताया, ‘मैंने नहीं सुना कि उन्होंने खुदा से अपने किए के लिए माफी मांगी होगी। मरने के नजदीक पहुंचने वाला हर शख्स खुदा से अपने किए गुनाहो के लिए माफी मांगता है, लेकिन सद्दाम उनमें से नहीं थे। उन्होंने अपने मुंह से पछतावे का कोई लफ्ज़ नहीं निकाला।’ दो दहा तक इराक पर हुक्मरानी करने वाले सद्दाम हुसैन को इंसानियत के खिलाफ जुर्म का मुजरिम पाए जाने के बाद 30 दिसंबर, 2006 को फांसी दे दी गई थी। उन पर साल 1982 में दुजाली के गांव में 148 शिया मुसलमानों के कत्ल का इल्ज़ाम था।

रुबाई ने बताया कि, ‘जब मैं उन्हें अदालत में जज के सामने लाया, उनके हाथ बंधे थे। उन्होंने हाथों में कुरान पकड़ी हुई थी। जज ने उन पर लगे इल्ज़ामात को पढ़कर सुनाया। सद्दाम जोर से चिल्लाने लगे, अमेरिका मुर्दाबाद, इजरायल मुर्दाबाद, फलस्तीन जिंदाबाद। इसके बाद मैं उन्हें वहां ले जाया गया, जहां उन्हें फांसी दी जानी थी।’ उन्होंने बताया, सद्दाम रुक गए। उन्होंने फांसी के तख्ते को देखा और मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। मैं और कुछ आफीसर उन्हें फांसी के तख्ते तक ले गए थे।

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