सपा- बसपा गठबंधन: फायदा किस पार्टी को?, मायावती या अखिलेश यादव को?

सपा- बसपा गठबंधन: फायदा किस पार्टी को?, मायावती या अखिलेश यादव को?

आखिरकार उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने मिल कर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. गठबंधन तो हो गया, लेकिन इससे असली फायदा किसको होगा, जानिए.

उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख पार्टियों- समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने 2019 में लोकसभा चुनाव एक साथ लड़ने का फैसला किया है और दोनों ने 38-38 सीटों पर लड़ने की घोषणा की है.

लखनऊ के ताज होटल में एसपी नेता अखिलेश यादव और बीएसपी नेता मायावती ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वे रायबरेली और अमेठी की सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारेंगी और दो सीटें इसलिए छोड़ी जा रही हैं ताकि गठबंधन में अन्य दलों को भी शामिल किया जा सके.

हालांकि पहले माना जा रहा था कि इस गठबंधन में कांग्रेस और आरएलडी भी शामिल होंगी लेकिन फिलहाल इनसे दूरी बनाकर रखी गई है. जानकारों का कहना है कि आरएलडी के साथ तो समझौते की बात अभी भी चल रही है लेकिन कांग्रेस गठबंधन में शामिल नहीं होगी, ये तय हो चुका है.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिली थीं जबकि बीएसपी को एक भी सीट हासिल नहीं हुई. लेकिन पिछले साल जब फूलपुर और गोरखपुर की लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए तो समाजवादी पार्टी ने ये दोनों सीटें जीत लीं. इन सीटों पर बीएसपी ने उसे समर्थन दिया था.

वहीं बाद में कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी आरएलटी उम्मीदवार को एसपी और बीएसपी के अलावा कांग्रेस ने भी समर्थन दिया और गठबंधन की जीत हुई. यहीं से गठबंधन की राह निकल पड़ी.

करीब 25 साल पहले अयोध्या आंदोलन के दौरान भी बीजेपी को रोकने के लिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और बीएसपी प्रमुख कांशीराम ने हाथ मिलाया था. यह संयोग ही है कि इस बार भी इन दोनों दलों के एक साथ आने का कारण भी भारतीय जनता पार्टी ही है.

2014 के लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की इकतरफा जीत ने दोनों ही पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया और फिर उपचुनाव में मिली जीत ने इन्हें एक साथ आने का साहस, ऊर्जा और विश्वास दिया.

जानकारों का कहना है कि राज्य में जिस तरह से जाति और धर्म के आधार पर मतदान होता है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि दोनों दलों का साथ आना बीजेपी के लिए खतरे की घंटी हो सकता है. हालांकि बीजेपी अभी भी ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह इन सबसे बेफिक्र है.

दिल्ली में चल रही बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने गठबंधन की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि अब की बार बीजेपी अस्सी में से 74 सीटें जीतेगी.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, “अमित शाह का यह कहना ही उनकी चिंता को दिखा रहा है. इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों पार्टियों के पास एक अच्छा खासा जनाधार है. दोनों के ही पास समर्पित मतदाता. परिस्थितियों को देखकर लगता भी है कि दोनों ही पार्टियां अपने वोटों को एक दूसरे को ट्रांसफर कराने में कामयाब होंगी.”

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 71 और उसकी सहयोगी अपना दल ने 2 सीटें जीतीं थीं. वहीं एसपी के खाते में पांच और कांग्रेस के खाते में सिर्फ दो सीटें ही आई थीं और बीएसपी का खाता भी नहीं खुला था. जहां तक मत प्रतिशत का सवाल है तो बीजेपी और अपना दल को करीब 43 फीसदी वोट हासिल हुए थे.

यानी, दोनों के मत प्रतिशत में सिर्फ एक फीसद का अंतर था जबकि सीटों के लिहाज से देखें तो राज्य में 41 सीटें ऐसी थीं जहां एसपी और बीएसपी ने मिलकर बीजेपी से ज्यादा वोट हासिल किए थे. माना जा रहा है कि यदि वोटिंग पैटर्न वैसा ही रहा जैसा कि 2014 में था तो सीटों के लिहाज से गठबंधन को बड़ा फायदा तो बीजेपी को भारी नुकसान हो सकता है.

हालांकि राजनातिक टिप्पणीकारों का यह भी कहना है कि चुनाव में पार्टियों का मिलना या गठबंधन होना गणित के आधार पर नहीं, बल्कि केमिस्ट्री के आधार पर परिणाम देते हैं. राजनीतिक विश्लेषक बद्री नारायण कहते हैं कि चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी वोटों की गणित के आधार पर नहीं की जा सकती.

साभार- ‘डी डब्ल्यू हिन्दी’

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